- सूरदास (सन् 1478–1583) कृष्णभक्ति शाखा के अष्टछाप कवियों में सर्वश्रेष्ठ हैं; इन्हें वात्सल्य और श्रृंगार का श्रेष्ठ कवि माना जाता है।
- ये चारों पद सूरसागर के भ्रमरगीत प्रसंग से लिए गए हैं, जिनकी भाषा सरस ब्रजभाषा है।
- कृष्ण के मथुरा जाने के बाद, स्वयं न लौटकर उन्होंने उद्धव के द्वारा गोपियों के पास निर्गुण-ज्ञान एवं योग का संदेश भेजा।
- गोपियाँ प्रेम-मार्ग की पक्की हैं; वे उद्धव के शुष्क ज्ञान-मार्ग को व्यंग्य और तर्क से परास्त कर देती हैं — यही वाग्विदग्धता इन पदों की जान है।
- अंतिम पद में गोपियाँ कृष्ण को राजधर्म (प्रजा का हित) याद दिलाती हैं, जो सूरदास की लोकधर्मिता को दर्शाता है।
- बोर्ड में महत्त्व: लगभग 4 अंक प्रतिवर्ष — एक पद की व्याख्या/भावार्थ (2–3 अंक) तथा एक लघु-उत्तरीय प्रश्न (भाव/संदेश), साथ ही MCQ।
1. कवि-परिचय — सूरदास
जन्म एवं जीवन: सूरदास का जन्म सन् 1478 में माना जाता है। एक मान्यता के अनुसार उनका जन्म मथुरा के निकट रुनकता (रेणुका क्षेत्र) में हुआ, जबकि दूसरी मान्यता के अनुसार उनका जन्म-स्थान दिल्ली के पास सीही है। वे महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे और अष्टछाप के कवियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध माने जाते हैं। वे मथुरा और वृंदावन के बीच गऊघाट पर रहते थे तथा श्रीनाथ जी के मंदिर में भजन-कीर्तन करते थे। सन् 1583 में पारसौली में उनका निधन हुआ।
रचनाएँ: उनके तीन प्रसिद्ध ग्रंथ हैं — सूरसागर, साहित्य लहरी और सूरसारावली। इनमें सूरसागर सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ। प्रस्तुत चारों पद इसी सूरसागर के भ्रमरगीत प्रसंग से लिए गए हैं।
काव्यगत विशेषताएँ: सूर ने खेती और पशुपालन वाले भारतीय समाज का दैनिक एवं अंतरंग चित्र तथा मनुष्य की स्वाभाविक वृत्तियों का सजीव चित्रण किया। वे वात्सल्य और श्रृंगार के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उन्होंने कृष्ण और गोपियों के प्रेम के माध्यम से सहज मानवीय प्रेम की प्रतिष्ठा की और सामान्य मनुष्य को हीनता-बोध से मुक्त किया। उनकी कविता में ब्रजभाषा का निखरा हुआ, मधुर रूप मिलता है, जो लोकगीतों की परंपरा की श्रेष्ठ कड़ी है।
2. भ्रमरगीत — पृष्ठभूमि एवं प्रसंग
कृष्ण मथुरा चले जाने के बाद स्वयं वापस न आकर गोपियों के पास उद्धव को संदेशवाहक बनाकर भेजते हैं। उद्धव निर्गुण ब्रह्म और योग का उपदेश देकर गोपियों की विरह-वेदना को शांत करने का प्रयास करते हैं। परंतु गोपियाँ ज्ञान-मार्ग की बजाय प्रेम-मार्ग को पसंद करती हैं, इसलिए उन्हें उद्धव का यह शुष्क (नीरस) संदेश अच्छा नहीं लगता।
तभी वहाँ एक भौंरा (भ्रमर) आ पहुँचता है। यहीं से भ्रमरगीत का प्रारंभ होता है। गोपियाँ भ्रमर को संबोधित करने के बहाने वास्तव में उद्धव पर व्यंग्य-बाण छोड़ती हैं। ‘भ्रमरगीत’ में गोपियों की वाक्पटुता, उनका कृष्ण-प्रेम और उनकी तर्क-शक्ति अद्भुत रूप में प्रकट होती है।
3. पद (1) — “ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी”
मूल पंक्तियाँ: ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी। / अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी। / पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी। / ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौ लागी। / प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोर्यौ, दृष्टि न रूप परागी। / ‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी॥
सरल भावार्थ: गोपियाँ उद्धव पर व्यंग्य करते हुए कहती हैं — हे उद्धव! तुम तो बहुत भाग्यशाली हो। तुम प्रेम के बंधन से सर्वथा अछूते (अपरस) रहे; तुम्हारा मन कभी किसी के प्रति अनुरक्त ही नहीं हुआ। तुम तो उस कमल के पत्ते जैसे हो जो जल के भीतर रहकर भी जल से नहीं भीगता, उस पर पानी का दाग तक नहीं लगता। अथवा तुम उस तेल की मटकी जैसे हो जो जल में डुबाई जाने पर भी उस पर पानी की एक बूँद नहीं ठहरती। तुमने तो प्रेम-रूपी नदी में कभी अपना पैर ही नहीं डुबोया (प्रेम का अनुभव ही नहीं किया) और न ही तुम्हारी दृष्टि किसी के रूप-सौंदर्य पर मुग्ध हुई। पर हम तो अबला और भोली स्त्रियाँ हैं — जैसे चींटी गुड़ में लिपटकर (चिपककर) रह जाती है, वैसे ही हम भी कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह डूबी हुई हैं।
गोपियाँ उद्धव की प्रेम-शून्यता पर तीखा व्यंग्य करती हैं। जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी निर्लिप्त रहता है, वैसे ही उद्धव प्रेम-संसार के बीच रहकर भी उससे अछूते हैं। यह ‘तारीफ़’ ऊपर से प्रशंसा-सी लगती है, पर भीतर गहरा उपालंभ (शिकायत) छिपा है कि तुम प्रेम का मर्म जानते ही नहीं।
मुख्य भाव: उद्धव ‘भाग्यवान’ इसलिए नहीं कि वे ज्ञानी हैं, बल्कि गोपियों के व्यंग्य में ‘भाग्यहीन’ हैं क्योंकि वे प्रेम के अनमोल रस से वंचित रह गए। प्रेम-विहीन ज्ञान की निरर्थकता और प्रेम की श्रेष्ठता यहाँ स्थापित होती है।
4. पद (2) — “मन की मन ही माँझ रही”
मूल पंक्तियाँ: मन की मन ही माँझ रही। / कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही। / अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही। / अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही। / चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही। / ‘सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही॥
सरल भावार्थ: गोपियाँ कहती हैं — हमारे मन की बात मन में ही रह गई, अब किससे जाकर कहें? यह बात कहते भी नहीं बनती। हमने इस आशा के सहारे ही तन-मन की सारी व्यथा (बिथा) सही कि एक निश्चित अवधि के बाद कृष्ण लौट आएँगे। पर अब इस योग के संदेशों को सुन-सुनकर विरह में जलने वाली हम विरहिणियों का विरह और भी बढ़ गया है (विरह की आग में और जल उठीं)। हम जिस ओर से (कृष्ण से) रक्षा की गुहार लगाना चाहती थीं, उसी ओर से तो (योग की) प्रबल धारा बह निकली। अब हम धैर्य कैसे धारण करें — कृष्ण ने तो प्रेम की मर्यादा ही नहीं रखी।
गोपियाँ कहना चाहती हैं कि जिस कृष्ण से उन्हें सांत्वना और रक्षा की उम्मीद थी, उन्हीं ने योग का नीरस संदेश भेजकर उनके दुःख को और गहरा कर दिया। बचाने वाले की ओर से ही विपत्ति की धारा आ गई — यह उनकी पीड़ा की पराकाष्ठा है।
मुख्य भाव: गोपियों के मन की अभिलाषाएँ मन में ही दबी रह गईं; योग-संदेश ने उनकी विरह-वेदना घटाने के बजाय बढ़ा दी। ‘मरजादा न लही’ में कृष्ण द्वारा प्रेम की मर्यादा न निभाने का उपालंभ है।
5. पद (3) — “हमारैं हरि हारिल की लकरी”
मूल पंक्तियाँ: हमारैं हरि हारिल की लकरी। / मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी। / जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री। / सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी। / सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी। / यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी॥
सरल भावार्थ: गोपियाँ कहती हैं — हमारे लिए तो कृष्ण हारिल पक्षी की लकड़ी के समान हैं। (हारिल पक्षी अपने पैरों में सदा एक लकड़ी पकड़े रहता है और उसे कभी नहीं छोड़ता।) हमने अपने मन, कर्म और वचन से नंद के पुत्र कृष्ण को अपने हृदय में दृढ़तापूर्वक पकड़ रखा है। जागते-सोते, स्वप्न में, दिन-रात — हम तो बस ‘कान्ह-कान्ह’ ही रटती रहती हैं। यह योग का संदेश तो हमें ऐसा कड़वा (करुई ककड़ी) लगता है (जिसे न निगलते बनता है न उगलते)। उद्धव तो हमारे लिए ऐसी व्याधि (रोग) ले आए हैं जिसे हमने न कभी देखा, न सुना, न भोगा। हे सूर! यह योग तो उन्हें जाकर सौंप दो जिनका मन स्थिर नहीं है (जो चकई की तरह घूमता रहता है)।
यह पद गोपियों के अनन्य (एकनिष्ठ) प्रेम की दृढ़ता का सर्वोत्तम उदाहरण है। जैसे हारिल पक्षी लकड़ी को क्षण भर भी नहीं छोड़ता, वैसे ही गोपियों ने कृष्ण को अपने जीवन का एकमात्र आधार बना लिया है। योग का ज्ञान उनके इस अटूट प्रेम के सामने कड़वी ककड़ी जैसा व्यर्थ है।
मुख्य भाव: गोपियों का कृष्ण के प्रति अनन्य, एकनिष्ठ और अटल प्रेम। योग-साधना उनके लिए असहनीय रोग है; वे इसे चंचल मन वालों के लिए उपयुक्त बताकर अस्वीकार कर देती हैं।
6. पद (4) — “हरि हैं राजनीति पढ़ि आए”
मूल पंक्तियाँ: हरि हैं राजनीति पढ़ि आए। / समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए। / इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुर ग्रंथ पढ़ाए। / बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए। / ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए। / अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए। / ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए। / राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए॥
सरल भावार्थ: गोपियाँ कटाक्ष करती हैं — लगता है कृष्ण अब राजनीति पढ़कर आ गए हैं। भौंरे (उद्धव) की बातें सुनकर हमने सारी बात समझ ली और सब समाचार पा लिए। कृष्ण तो पहले से ही अत्यंत चतुर थे, अब तो उन्होंने गुरु के ग्रंथ भी पढ़ लिए हैं। जब उनकी बुद्धि और भी बढ़ गई, तभी तो उन्होंने हमें योग का संदेश भेजा। हे उद्धव! पहले के लोग बड़े भले होते थे जो दूसरों के हित (पर हित) के लिए दौड़ते-फिरते थे। अब हम अपना वह मन फिर से वापस पा लेंगी जिसे चलते समय कृष्ण चुरा ले गए थे। जो स्वयं दूसरों की अनीति छुड़ाते हैं, वे भला स्वयं अनीति कैसे कर सकते हैं? हे सूर! राजधर्म तो यही है कि प्रजा को कभी सताया न जाए।
इस अंतिम पंक्ति में गोपियाँ कृष्ण को मार्मिक एवं तीखा उलाहना देती हैं। प्रेम की शिकायत अब लोकनीति में बदल जाती है — एक राजा का सच्चा धर्म प्रजा की रक्षा है, उसे पीड़ा देना नहीं। गोपियाँ स्वयं को प्रजा मानकर कृष्ण को उनके कर्तव्य की याद दिलाती हैं। यहाँ सूरदास की लोकधर्मिता स्पष्ट दिखाई देती है।
मुख्य भाव: गोपियाँ अपने वाक्चातुर्य से ज्ञानी उद्धव को पराजित कर देती हैं और कृष्ण को राजधर्म (प्रजा-हित) की सीख देती हैं — विरह की वेदना अंत में सामाजिक-नैतिक संदेश का रूप ले लेती है।
7. काव्य-सौंदर्य — रस, अलंकार एवं भाषा-शैली
भाषा: मधुर, सरस और कोमल ब्रजभाषा। गेयता (लय-ताल) के कारण ये पद गाए जा सकते हैं।
छंद एवं शैली: गीतात्मक पद शैली; मुक्तक काव्य। संवाद और व्यंग्य की प्रधानता — गोपियों की वाग्विदग्धता (वाक्चातुर्य) इन पदों की सबसे बड़ी विशेषता है।
रस: वियोग (विप्रलंभ) श्रृंगार प्रमुख है, क्योंकि गोपियाँ कृष्ण के विरह में तड़प रही हैं।
प्रमुख अलंकार:
- दृष्टांत/उपमा: “पुरइनि पात रहत जल भीतर”, “ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि”, “गुर चाँटी ज्यौं पागी” — एक बात को उदाहरण से स्पष्ट करना।
- रूपक: “प्रीति-नदी” (प्रेम रूपी नदी), “हारिल की लकरी” (कृष्ण रूपी आधार)।
- अनुप्रास: “मन की मन ही माँझ”, “कान्ह-कान्ह”, “सुनि-सुनि” — एक ही वर्ण की आवृत्ति।
- पुनरुक्ति: “सुनि-सुनि”, “कान्ह-कान्ह” — शब्दों की पुनरावृत्ति।
8. कठिन शब्दार्थ
| बड़भागी | भाग्यवान |
| अपरस | अलिप्त, नीरस, अछूता |
| तगा | धागा, बंधन |
| पुरइनि पात | कमल का पत्ता |
| दागी | दाग, धब्बा |
| प्रीति-नदी | प्रेम की नदी |
| बोर्यौ | डुबोया |
| परागी | मुग्ध होना |
| गुर चाँटी ज्यौं पागी | जैसे चींटी गुड़ में लिपटती है, वैसे ही हम कृष्ण के प्रेम में अनुरक्त हैं |
| अधार | आधार |
| आवन | आगमन |
| बिथा | व्यथा |
| बिरहिनि | वियोग में जीने वाली |
| बिरह दही | विरह की आग में जल रही हैं |
| गुहारि | रक्षा के लिए पुकारना |
| मरजादा | मर्यादा, प्रतिष्ठा |
| हारिल | एक पक्षी जो अपने पैरों में सदा एक लकड़ी पकड़े रहता है, उसे छोड़ता नहीं |
| जक री | रटती रहती हैं |
| ब्याधि | रोग, पीड़ा पहुँचाने वाली वस्तु |
| मन चकरी | जिनका मन स्थिर नहीं रहता |
| मधुकर | भौंरा, उद्धव के लिए गोपियों द्वारा प्रयुक्त संबोधन |
| पठाए | भेजा |
| पर हित | दूसरों के कल्याण के लिए |
| अनीति | अन्याय |
9. NCERT प्रश्न-अभ्यास — पूर्ण उत्तर
प्र.1. गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है?
उत्तर: गोपियाँ उद्धव को भाग्यवान कहकर वास्तव में व्यंग्य करती हैं कि वे प्रेम जैसे अनमोल भाव से वंचित रह गए हैं। कृष्ण के निकट रहते हुए भी जो उनके प्रेम-रस में नहीं डूब सका, वह भाग्यवान नहीं बल्कि अभागा है। ‘भाग्यवान’ कहकर वे उद्धव की प्रेम-शून्यता और नीरसता पर तीखा कटाक्ष करती हैं।
प्र.2. उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है?
उत्तर: उद्धव के निर्लिप्त व्यवहार की तुलना (क) जल में रहकर भी न भीगने वाले कमल के पत्ते से, और (ख) जल में डुबाने पर भी जिस पर एक बूँद न ठहरे, ऐसी तेल की मटकी (गागरि) से की गई है। दोनों उदाहरण उद्धव के प्रेम से अछूते रहने को दर्शाते हैं।
प्र.3. गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं?
उत्तर: गोपियों ने कमल के पत्ते, तेल की मटकी, प्रीति-नदी में पैर न डुबोने, और चींटी के गुड़ में लिपटने (अपने प्रेम के संदर्भ में) जैसे उदाहरणों से उद्धव को उलाहने दिए। इनके द्वारा वे सिद्ध करती हैं कि उद्धव ने कभी प्रेम का अनुभव नहीं किया जबकि वे स्वयं कृष्ण-प्रेम में पूर्णतः डूबी हैं।
प्र.4. उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम कैसे किया?
उत्तर: गोपियाँ इस आशा में विरह सह रही थीं कि कृष्ण लौट आएँगे और उन्हें सांत्वना मिलेगी। परंतु कृष्ण ने प्रेम के बदले योग का नीरस संदेश भेजा, जिससे उनकी आशा टूट गई और विरह की पीड़ा घटने के बजाय और भड़क उठी — मानो विरहाग्नि में घी पड़ गया हो।
प्र.5. ‘मरजादा न लही’ के माध्यम से कौन-सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है?
उत्तर: यहाँ प्रेम की मर्यादा न रहने की बात कही गई है। प्रेम की मर्यादा यह है कि प्रेमी अपने प्रिय की भावनाओं का ध्यान रखे और उसे सांत्वना दे। कृष्ण ने स्वयं न आकर योग-संदेश भेजकर इस प्रेम की मर्यादा को नहीं निभाया।
प्र.6. कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है?
उत्तर: गोपियों ने कृष्ण को ‘हारिल की लकड़ी’ कहकर अपने अनन्य प्रेम को व्यक्त किया है। जैसे हारिल पक्षी लकड़ी को कभी नहीं छोड़ता, वैसे ही उन्होंने मन, कर्म और वचन से कृष्ण को हृदय में दृढ़ता से पकड़ रखा है। जागते-सोते, स्वप्न में, दिन-रात वे केवल ‘कान्ह-कान्ह’ रटती रहती हैं।
प्र.7. गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है?
उत्तर: गोपियों ने कहा कि योग की शिक्षा उन लोगों को दी जानी चाहिए जिनका मन चंचल और अस्थिर है (जिनका मन चकई की तरह घूमता रहता है)। उनका तो मन पहले से ही कृष्ण में पूरी तरह स्थिर और एकनिष्ठ है, इसलिए उन्हें योग की कोई आवश्यकता नहीं।
प्र.8. प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट करें।
उत्तर: गोपियाँ योग-साधना को नीरस, कठिन और अनुपयोगी मानती हैं। उनके लिए यह ‘कड़वी ककड़ी’ और ‘व्याधि (रोग)’ के समान है, जिसे उन्होंने न देखा, न सुना, न भोगा। उनका मार्ग प्रेम का है, इसलिए वे ज्ञान और योग को अपने एकनिष्ठ प्रेम के सामने व्यर्थ मानती हैं।
प्र.9. गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए?
उत्तर: गोपियों के अनुसार राजा का धर्म यह है कि वह अपनी प्रजा को कभी न सताए, बल्कि उसकी रक्षा और हित करे। वे कृष्ण को राजा मानकर यह याद दिलाती हैं कि प्रजा को दुःख देना राजधर्म के विरुद्ध है।
प्र.10. गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं?
उत्तर: गोपियों को लगा कि कृष्ण अब राजनीति पढ़कर अत्यधिक चतुर एवं छली हो गए हैं; उन्होंने प्रेम के स्थान पर योग का नीरस संदेश भेजा। ऐसे बदले हुए, स्वार्थी प्रतीत होते कृष्ण से अब उन्हें प्रेम की आशा नहीं रही, इसलिए वे कहती हैं कि अब वे अपना चुराया हुआ मन वापस पा लेंगी।
प्र.11. गोपियों ने अपने वाक्चातुर्य के आधार पर ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया, उनके वाक्चातुर्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: गोपियों का वाक्चातुर्य व्यंग्य, तर्क और उपमाओं से भरा है। वे सीधे प्रहार न कर भौंरे के बहाने उद्धव पर कटाक्ष करती हैं, उपयुक्त उदाहरणों से अपनी बात सिद्ध करती हैं, और अंत में राजधर्म का तर्क देकर ज्ञानी उद्धव को निरुत्तर कर देती हैं। उनकी भाषा में चातुर्य, मार्मिकता और हास-परिहास का सुंदर मेल है।
प्र.12. संकलित पदों को ध्यान में रखते हुए सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: (1) वियोग श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति; (2) गोपियों की अद्भुत वाग्विदग्धता एवं व्यंग्य; (3) प्रेम-मार्ग की ज्ञान-मार्ग पर श्रेष्ठता का प्रतिपादन; (4) मधुर ब्रजभाषा एवं गेयता; (5) उपमा, रूपक, दृष्टांत आदि अलंकारों का सहज प्रयोग; (6) अंत में लोकधर्मिता एवं नीतिगत संदेश।
रचना और अभिव्यक्ति
प्र.13. गोपियों ने उद्धव के सामने तरह-तरह के तर्क दिए हैं, आप अपनी कल्पना से और तर्क दीजिए।
उत्तर: (नमूना) जैसे दीपक के बिना प्रकाश की बात व्यर्थ है, वैसे ही प्रेम के बिना ज्ञान निर्जीव है। जिसने कभी भूख न जानी हो, वह भोजन का स्वाद कैसे बता सकता है? इसी प्रकार जिसने प्रेम न किया हो, वह प्रेमियों को उपदेश देने का अधिकारी नहीं।
प्र.14. उद्धव ज्ञानी थे, नीति की बातें जानते थे; गोपियों के पास ऐसी कौन-सी शक्ति थी जो उनके वाक्चातुर्य में मुखरित हो उठी?
उत्तर: गोपियों के पास कृष्ण के प्रति अनन्य, सच्चा और गहरा प्रेम था। यही प्रेम-शक्ति उनके आत्मविश्वास, तर्क और वाक्चातुर्य के रूप में मुखरित हुई, जिसके आगे उद्धव का शुष्क ज्ञान टिक न सका।
प्र.15. गोपियों ने यह क्यों कहा कि हरि अब राजनीति पढ़ आए हैं? क्या आपको गोपियों के इस कथन का विस्तार समकालीन राजनीति में नज़र आता है?
उत्तर: गोपियों को लगा कि कृष्ण ने प्रेम के बदले छल और कूटनीति का सहारा लिया, इसलिए वे व्यंग्य करती हैं कि कृष्ण राजनीति पढ़ आए हैं। आज भी राजनीति में सीधी-सच्ची बात के बजाय छल, टालमटोल और चतुराई दिखाई देती है; इस अर्थ में गोपियों का कथन समकालीन राजनीति पर भी लागू होता है।
10. ध्यान देने योग्य बातें
- ये पद ‘सूरसागर’ के भ्रमरगीत प्रसंग से लिए गए हैं — संदेशवाहक उद्धव हैं और संबोधन कभी-कभी भौंरे (मधुकर) को है।
- मूल टकराव प्रेम-मार्ग बनाम ज्ञान/योग-मार्ग का है; सूर प्रेम-मार्ग की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं।
- ‘हारिल की लकड़ी’ = अनन्य प्रेम का प्रतीक; इसे याद रखें — परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है।
- अंतिम पद में विरह की शिकायत राजधर्म/लोकनीति में बदल जाती है — यह सूर की लोकधर्मिता है।
- भाषा ब्रजभाषा है; रस वियोग (विप्रलंभ) श्रृंगार है — ये तथ्य उत्तर में अवश्य लिखें।
11. त्वरित पुनरावृत्ति
- कवि: सूरदास (1478–1583), अष्टछाप, वल्लभाचार्य के शिष्य; ग्रंथ — सूरसागर, साहित्य लहरी, सूरसारावली।
- पद 1: उद्धव ‘बड़भागी’ — व्यंग्य; कमल-पत्ता व तेल की गागरि से तुलना।
- पद 2: ‘मन की मन ही माँझ रही’ — योग-संदेश से विरह बढ़ा; ‘मरजादा न लही’।
- पद 3: ‘हारिल की लकरी’ — अनन्य प्रेम; योग = कड़वी ककड़ी व व्याधि।
- पद 4: ‘हरि हैं राजनीति पढ़ि आए’ — राजधर्म = प्रजा न सताना।
- रस — वियोग श्रृंगार; भाषा — ब्रजभाषा; मुख्य गुण — गोपियों की वाग्विदग्धता।
- साहित्य लहरी — विनय
- सूरसागर — भ्रमरगीत
- सूरसारावली — बाललीला
- सूरसागर — रासलीला
- रामानंद — रामभक्त
- वल्लभाचार्य — अष्टछाप
- निंबार्क — सखी संप्रदाय
- तुलसीदास — रामचरित
- वे बहुत धनी थे
- वे कृष्ण के मित्र थे
- व्यंग्यवश — वे प्रेम-रस से वंचित रहे
- वे योगी थे
- कमल के पत्ते व तेल की गागरि से
- हारिल पक्षी से
- चींटी से
- नदी की धारा से
- योग-साधना का
- गोपियों के अनन्य प्रेम/एकमात्र आधार का
- विरह का
- राजनीति का
- मीठे फल जैसा
- कड़वी ककड़ी एवं व्याधि जैसा
- अमृत जैसा
- शीतल जल जैसा
- राजनीति की
- समाज की
- प्रेम की
- धन की
- जिनका मन स्थिर है
- जिनका मन चंचल/अस्थिर (मन चकरी) है
- केवल योगियों को
- केवल राजाओं को
- बाललीला
- राजधर्म — प्रजा को न सताना
- गुरु की शिक्षा
- योग का महत्त्व
- वीर रस — अवधी
- हास्य रस — खड़ी बोली
- वियोग (विप्रलंभ) श्रृंगार — ब्रजभाषा
- शांत रस — संस्कृत
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