- यह स्वयं प्रकाश द्वारा रचित एक मार्मिक कहानी है, जो एक छोटे कस्बे में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की संगमरमर की मूर्ति के चश्मे के इर्द-गिर्द घूमती है।
- मूर्ति बनाने वाले मास्टर मोतीलाल पत्थर का चश्मा नहीं बना पाए; उस कमी को एक गरीब, लँगड़ा चश्मेवाला कैप्टन रोज़ अपना असली चश्मा मूर्ति पर लगाकर पूरा करता रहा।
- हालदार साहब हर पंद्रह दिन में कस्बे से गुज़रते हुए मूर्ति पर बदलते चश्मे देखकर चकित होते हैं और अंत में कैप्टन की निस्वार्थ देशभक्ति से भावुक हो उठते हैं।
- कहानी का मूल भाव — देशभक्ति केवल बड़े लोगों या सेना का काम नहीं; आम, साधारण और छोटे लोग भी अपने-अपने तरीके से देश-निर्माण में योगदान देते हैं।
- परीक्षा में महत्त्व: लगभग 4 अंक प्रतिवर्ष — प्रायः एक गद्यांश/लघु-उत्तरीय (कैप्टन या हालदार साहब का चरित्र, शीर्षक की सार्थकता) तथा MCQ।
1. लेखक परिचय — स्वयं प्रकाश
स्वयं प्रकाश का जन्म सन् 1947 में इंदौर (मध्यप्रदेश) में हुआ। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में नौकरी की। उनका बचपन और नौकरी का बड़ा हिस्सा राजस्थान में बीता। वे ‘वसुधा’ पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे। निधन सन् 2019 में हुआ।
आठवें दशक में उभरे स्वयं प्रकाश समकालीन कहानी के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर माने जाते हैं। उनके प्रमुख कहानी-संग्रह हैं — सूरज कब निकलेगा, आएँगे अच्छे दिन भी, आदमी जात का आदमी तथा संधान। उनके उपन्यास बीच में विनय और ईंधन चर्चित रहे। उन्हें पहल सम्मान, बनमाली पुरस्कार, राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार आदि से सम्मानित किया गया।
रचना-शैली: स्वयं प्रकाश मध्यवर्गीय जीवन के कुशल चितेरे हैं। उनकी कहानियों में वर्ग-शोषण के विरुद्ध चेतना है और जाति, संप्रदाय व लिंग के आधार पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ़ प्रतिकार का स्वर भी। उनकी कहानियाँ रोचक किस्सागोई शैली में लिखी गई हैं, जो हिंदी की वाचिक (मौखिक) परंपरा को समृद्ध करती हैं।
2. कहानी का विस्तृत सार
कस्बे का परिचय: हालदार साहब को हर पंद्रहवें दिन कंपनी के काम के सिलसिले में एक कस्बे से गुज़रना पड़ता था। कस्बा बहुत बड़ा नहीं था — कुछ पक्के मकान, एक बाज़ार, लड़कों व लड़कियों के स्कूल, सीमेंट का छोटा कारखाना, दो ओपन एयर सिनेमाघर और एक नगरपालिका थी। नगरपालिका कभी सड़क पक्की करवाती, कभी कबूतरों की छतरी बनवाती, तो कभी कवि सम्मेलन करवाती।
मूर्ति की स्थापना: इसी नगरपालिका के किसी उत्साही अधिकारी ने शहर के मुख्य बाज़ार के मुख्य चौराहे पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की संगमरमर की प्रतिमा लगवा दी। मूर्ति बनाने का काम कस्बे के इकलौते हाई स्कूल के इकलौते ड्राइंग मास्टर मोतीलाल जी को सौंपा गया, जो महीने भर में मूर्ति बनाकर ‘पटक देने’ का विश्वास दिला रहे थे।
चश्मे की कमी: मूर्ति संगमरमर की, टोपी की नोक से कोट के दूसरे बटन तक कोई दो फुट ऊँची, फ़ौजी वर्दी में बहुत सुंदर बनी थी। उसे देखकर ‘दिल्ली चलो’ और ‘तुम मुझे खून दो’ जैसे नारे याद आते थे। केवल एक कमी थी — नेताजी की आँखों पर संगमरमर का बना चश्मा था, असली नहीं। पर पहली ही बार हालदार साहब ने देखा कि मूर्ति पर एक सचमुच का काला फ्रेमवाला चश्मा लगा है। उन्हें यह आइडिया बहुत अच्छा लगा — “मूर्ति पत्थर की, लेकिन चश्मा रियल!”
बदलते चश्मे: दूसरी बार गुज़रने पर हालदार साहब ने देखा कि चश्मा बदल गया है — पहले मोटे फ्रेमवाला चौकोर चश्मा था, अब तार के फ्रेमवाला गोल चश्मा। तीसरी बार फिर नया चश्मा। यह देखकर उनका कौतूहल बढ़ता गया और रुककर मूर्ति देखना उनकी आदत बन गई।
पानवाले से भेद खुलना: एक बार कौतूहलवश हालदार साहब ने पानवाले से पूछा कि नेताजी का चश्मा हर बार बदल कैसे जाता है। पानवाले ने हँसते हुए बताया — “कैप्टन चश्मेवाला करता है।” जब किसी ग्राहक को वैसा फ्रेम चाहिए होता है जैसा मूर्ति पर लगा है, तो कैप्टन मूर्ति वाला फ्रेम उतारकर ग्राहक को दे देता है और मूर्ति पर दूसरा चश्मा लगा देता है। यानी कैप्टन को नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति अच्छी नहीं लगती, मानो चश्मे के बिना नेताजी को असुविधा हो रही हो — इसलिए वह अपनी छोटी-सी दुकान के फ्रेमों में से एक मूर्ति पर लगा देता है।
कैप्टन का परिचय: हालदार साहब को लगा कि चश्मेवाला कैप्टन ज़रूर नेताजी का कोई साथी या आज़ाद हिंद फ़ौज का भूतपूर्व सिपाही होगा। पर पानवाले ने हँसते हुए बताया — वह तो एक बेहद बूढ़ा, मरियल-सा लँगड़ा आदमी है, जो सिर पर गांधी टोपी और आँखों पर काला चश्मा लगाए, बाँस पर बहुत-से चश्मे टाँगे फेरी लगाता है। उसकी अपनी दुकान भी नहीं थी। फिर भी लोग उसे प्यार और सम्मान से “कैप्टन” कहते थे।
मूर्तिकार की भूल: हालदार साहब ने सोचा — मूर्तिकार मास्टर मोतीलाल पत्थर में पारदर्शी चश्मा नहीं बना पाए होंगे, या काँच का चश्मा बनाते-बनाते टूट गया होगा। यानी ‘मास्टर बनाना भूल गया’ — चश्मे की कमी रह गई, और उसी कमी को कैप्टन रोज़ पूरा करता रहा।
दो साल का सिलसिला: दो साल तक हालदार साहब मूर्ति पर बदलते चश्मे देखते रहे — कभी गोल, कभी चौकोर, कभी लाल, कभी काला, कभी धूप का, तो कभी बड़े काँचों वाला गॉगल। पर कोई-न-कोई चश्मा अवश्य होता था, जो उस धूल भरी यात्रा में हालदार साहब को कौतुक के कुछ क्षण देता।
कैप्टन की मृत्यु: फिर एक बार मूर्ति की आँखों पर कोई चश्मा नहीं था और पान की दुकान भी बंद थी। अगली बार भी चश्मा नहीं था। हालदार साहब ने पूछा तो पानवाला उदास होकर, धोती के सिरे से आँखें पोंछता हुआ बोला — “साहब! कैप्टन मर गया।” हालदार साहब कुछ देर चुपचाप खड़े रहे, फिर पान के पैसे चुकाकर रवाना हो गए।
मार्मिक अंत: पंद्रह दिन बाद हालदार साहब ने सोचा कि अब मूर्ति पर चश्मा नहीं होगा, इसलिए वे आज मूर्ति की ओर देखेंगे भी नहीं। पर आदत से मजबूर आँखें चौराहा आते ही मूर्ति की ओर उठ गईं। उन्होंने जो देखा, उससे चीख निकल गई — जीप रुकवाकर वे मूर्ति के पास दौड़े और एटेंशन की मुद्रा में खड़े हो गए। मूर्ति की आँखों पर सरकंडे से बना छोटा-सा चश्मा रखा हुआ था, जैसा बच्चे बना लेते हैं। इतनी-सी बात पर हालदार साहब की आँखें भर आईं — क्योंकि अब छोटे बच्चे भी देश-प्रेम और कैप्टन की भावना को आगे बढ़ा रहे थे।
3. चरित्र-चित्रण
कैप्टन चश्मेवाला — कहानी का सबसे प्रभावशाली पात्र, यद्यपि वह कभी प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आता।
- सच्चा देशभक्त: सेना में न होते हुए भी उसमें असली फ़ौजी जैसी देशभक्ति की भावना थी। नेताजी की मूर्ति को बिना चश्मे के देखना उसे आहत करता था।
- निस्वार्थ व त्यागी: गरीब, बूढ़ा और लँगड़ा होते हुए भी अपनी सीमित दुकान के फ्रेमों में से एक मूर्ति पर लगा देता था, बिना किसी लाभ या प्रशंसा की चाह के।
- संवेदनशील: ग्राहक को वही फ्रेम बेचकर भी वह तुरंत मूर्ति पर दूसरा चश्मा लगा देता, मानो नेताजी से क्षमा माँगकर। यह उसकी गहरी संवेदना दर्शाता है।
- उसका नाम ‘कैप्टन’ पड़ना उसके प्रति लोगों के सम्मान का प्रतीक है।
हालदार साहब — कहानी का सूत्रधार और दृष्टा पात्र।
- कौतूहलप्रिय व जिज्ञासु: मूर्ति पर बदलते चश्मे देखकर रुकना, ध्यान देना और पानवाले से पूछताछ करना उनकी जिज्ञासा दर्शाता है।
- देशभक्त व भावुक: मूर्ति के प्रति सम्मान रखते हैं; कैप्टन की मृत्यु और सरकंडे के चश्मे पर भावुक होकर आँखें भर आना उनकी संवेदनशीलता का प्रमाण है।
- विचारशील: छोटी-छोटी घटनाओं में देश और समाज के गहरे अर्थ खोजते हैं।
पानवाला — हास्य व सूचना देने वाला पात्र।
- हँसमुख व खुशमिज़ाज: काला, मोटा, थुलथुल तोंदवाला आदमी, जो आँखों-ही-आँखों में हँसता रहता है।
- व्यापारी प्रवृत्ति: कैप्टन जैसे गरीब फेरीवाले का ‘पागल’ और ‘लँगड़ा’ कहकर मज़ाक उड़ाता है — उसमें संवेदनहीनता और सामान्य व्यावसायिक दृष्टि झलकती है।
- परंतु कैप्टन की मृत्यु पर उसका उदास होना दर्शाता है कि भीतर से वह भी संवेदनशील है।
मास्टर मोतीलाल — कस्बे के इकलौते हाई स्कूल के इकलौते ड्राइंग मास्टर, जिन्हें मूर्ति बनाने का काम मिला। वे उत्साही थे पर पत्थर में पारदर्शी चश्मा नहीं बना पाए — यही ‘भूल’ पूरी कहानी का आधार बन गई।
4. विषयवस्तु व शीर्षक की सार्थकता
विषयवस्तु: कहानी का केंद्रीय विषय है — आम आदमी की देशभक्ति। लेखक यह संदेश देते हैं कि चारों ओर सीमाओं से घिरे भूभाग का नाम ही देश नहीं होता; देश बनता है उसमें रहने वाले नागरिकों, नदियों, पहाड़ों, पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों से, और इन सबसे प्रेम करना ही सच्ची देशभक्ति है। बड़े ही नहीं, छोटे बच्चे भी इस भावना में शामिल हैं।
शीर्षक की सार्थकता: ‘नेताजी का चश्मा’ शीर्षक पूर्णतः सार्थक है —
- पूरी कहानी नेताजी की मूर्ति पर लगे और बार-बार बदलते चश्मे के इर्द-गिर्द घूमती है।
- चश्मा यहाँ केवल वस्तु नहीं, बल्कि देखने की दृष्टि का प्रतीक है — कैप्टन की देश को देखने वाली देशभक्त दृष्टि।
- चश्मे की कमी को पूरा करने का कैप्टन का प्रयास ही कहानी का मर्म है। अतः शीर्षक कथानक का केंद्रबिंदु और प्रतीक — दोनों है।
5. देशभक्ति का संदेश
कहानी हमें कई गहरे संदेश देती है:
- देशभक्ति वर्दी की मोहताज नहीं: सेना में न होकर भी एक साधारण फेरीवाला सच्चा देशभक्त हो सकता है। देशभक्ति मन की भावना है, पद या वेश की नहीं।
- छोटे योगदान का बड़ा मूल्य: कैप्टन का छोटा-सा प्रयास और बच्चों का सरकंडे का चश्मा बताते हैं कि देश-निर्माण में हर व्यक्ति का योगदान महत्त्वपूर्ण है।
- परंपरा का आगे बढ़ना: कैप्टन की मृत्यु के बाद भी बच्चों द्वारा चश्मा लगाना संकेत है कि देशभक्ति की भावना पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहती है।
- शहीदों का सम्मान: नेताजी जैसे महान सेनानियों की स्मृति का आदर करना हमारा कर्तव्य है।
6. महत्त्वपूर्ण प्रसंग
जब हालदार साहब पहली बार मूर्ति पर असली काला फ्रेमवाला चश्मा देखते हैं, तो उनके चेहरे पर कौतुकभरी मुस्कान फैल जाती है। यह प्रसंग कहानी का कौतूहल जगाता है और आगे की पूरी कथा का बीज बोता है।
पानवाले का यह उत्तर रहस्य खोलता है कि मूर्ति का चश्मा बार-बार क्यों बदलता है। यहीं से कैप्टन के निस्वार्थ देश-प्रेम का परिचय मिलता है।
कैप्टन की मृत्यु के बाद मूर्ति की आँखों पर बच्चों द्वारा बनाया सरकंडे का छोटा-सा चश्मा देखकर हालदार साहब की आँखें भर आती हैं। यह कहानी का सर्वाधिक मार्मिक और प्रतीकात्मक प्रसंग है — देशभक्ति की मशाल अगली पीढ़ी तक पहुँच गई।
7. कठिन शब्दार्थ
- कौतुक — कुतूहल, अचरज, मज़ेदार बात
- ऊहापोह — असमंजस, उधेड़बुन
- द्रवित — पिघला हुआ, भावुक
- दुर्दमनीय — जिसे दबाया न जा सके
- प्रफुल्लता — प्रसन्नता, खुशी
- हृदयस्थली — हृदय का स्थान, केंद्रीय भाग
- नतमस्तक — सम्मान में सिर झुकाना
- मरियल — कमज़ोर, दुबला-पतला
- फेरी लगाना — गली-गली घूमकर सामान बेचना
- संगमरमर — सफ़ेद चिकना पत्थर (मार्बल)
- सरकंडा — एक प्रकार की पतली नरकट की डंडी
- आहत — चोट खाया हुआ, दुखी
8. NCERT प्रश्न-अभ्यास के उत्तर
प्र.1 — सेनानी न होते हुए भी चश्मेवाले को लोग कैप्टन क्यों कहते थे?
उत्तर: चश्मेवाला सेना का सिपाही नहीं था, फिर भी उसमें एक सच्चे फ़ौजी जैसी देशभक्ति की भावना थी। नेताजी की मूर्ति पर चश्मा न होने को वह आहत भाव से देखता और हर बार अपना चश्मा मूर्ति पर लगा देता था। उसके इसी निस्वार्थ देश-प्रेम, त्याग और नेताजी के प्रति सम्मान के कारण लोग आदरवश उसे ‘कैप्टन’ कहते थे।
प्र.2 — हालदार साहब ने ड्राइवर को पहले चौराहे पर गाड़ी रोकने से मना किया था लेकिन बाद में तुरंत रोकने को कहा—
(क) हालदार साहब पहले मायूस क्यों हो गए थे? — उत्तर: पानवाले से कैप्टन की मृत्यु का समाचार सुनकर वे मायूस हो गए थे। उन्हें लगा कि अब देश में ऐसे सच्चे देशभक्त नहीं रहे और लोग देशभक्ति का मज़ाक उड़ाते हैं।
(ख) मूर्ति पर सरकंडे का चश्मा क्या उम्मीद जगाता है? — उत्तर: सरकंडे का चश्मा यह उम्मीद जगाता है कि देशभक्ति की भावना अभी जीवित है। कैप्टन के बाद अब छोटे बच्चे भी नेताजी के प्रति सम्मान और देश-प्रेम की भावना को आगे बढ़ा रहे हैं।
(ग) हालदार साहब इतनी-सी बात पर भावुक क्यों हो उठे? — उत्तर: एक छोटे बच्चे द्वारा सरकंडे का चश्मा बनाकर मूर्ति पर लगाना देशभक्ति की निरंतरता का प्रतीक था। यह देखकर हालदार साहब का हृदय भर आया कि देश-प्रेम की भावना अगली पीढ़ी तक पहुँच गई है।
प्र.3 — आशय स्पष्ट कीजिए: “बार-बार सोचते, क्या होगा उस कौम का जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी-ज़िंदगी सब कुछ होम देनेवालों पर भी हँसती है और अपने लिए बिकने के मौके ढूँढ़ती है।”
उत्तर: इसका आशय यह है कि जो लोग देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले शहीदों व देशभक्तों का मज़ाक उड़ाते हैं और स्वयं स्वार्थवश पैसे के लिए कुछ भी कर गुज़रते हैं, ऐसी स्वार्थी प्रवृत्ति वाली कौम का भविष्य अंधकारमय है। लेखक ऐसी आत्म-केंद्रित मानसिकता पर चिंता व्यक्त करते हैं।
प्र.4 — पानवाले का एक रेखाचित्र प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: पानवाला काला, मोटा और थुलथुल तोंदवाला खुशमिज़ाज आदमी था। उसके मुँह में हमेशा पान ठुँसा रहता और वह आँखों-ही-आँखों में हँसता रहता था। उसकी बत्तीसी लाल-काली थी। वह व्यापारी प्रवृत्ति का था और कैप्टन जैसे गरीब फेरीवाले का मज़ाक भी उड़ाता था, परंतु भीतर से संवेदनशील भी था।
प्र.5 — “वो लँगड़ा क्या जाएगा फ़ौज में। पागल है पागल!” कैप्टन के प्रति पानवाले की इस टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया लिखिए।
उत्तर: पानवाले की यह टिप्पणी संवेदनहीन और छिछली सोच को दर्शाती है। वह केवल शारीरिक अक्षमता देखता है, कैप्टन के भीतर की देशभक्ति नहीं। वास्तव में कैप्टन शारीरिक रूप से लँगड़ा होकर भी मन से सच्चा देशभक्त था। देशभक्ति शरीर की नहीं, मन और भावना की चीज़ है — इसलिए पानवाले की टिप्पणी अनुचित है।
प्र.6 — निम्नलिखित वाक्य पात्रों की कौन-सी विशेषता की ओर संकेत करते हैं—
(क) हालदार साहब हमेशा चौराहे पर रुकते और नेताजी को निहारते। — यह उनके देशभक्त, संवेदनशील और कौतूहलप्रिय स्वभाव की ओर संकेत करता है।
(ख) पानवाला उदास हो गया... साहब! कैप्टन मर गया। — यह पानवाले के भीतर छिपी संवेदनशीलता और मानवीयता को दर्शाता है।
(ग) कैप्टन बार-बार मूर्ति पर चश्मा लगा देता था। — यह कैप्टन की निस्वार्थ देशभक्ति और नेताजी के प्रति श्रद्धा की ओर संकेत करता है।
प्र.7 — जब तक हालदार साहब ने कैप्टन को साक्षात देखा नहीं था तब तक उनके मानस पटल पर उसका कौन-सा चित्र रहा होगा?
उत्तर: हालदार साहब के मन में कैप्टन की छवि एक हृष्ट-पुष्ट, अनुशासित फ़ौजी की रही होगी — कोई वीर सिपाही या नेताजी की आज़ाद हिंद फ़ौज का भूतपूर्व साथी, जो वर्दी पहने, सीना तानकर चलता हो। पर वास्तव में वह एक बूढ़ा, मरियल और लँगड़ा फेरीवाला निकला।
प्र.8 — कस्बों, शहरों, महानगरों के चौराहों पर मूर्ति लगाने का प्रचलन-सा हो गया है—
(क) उद्देश्य: महापुरुषों के प्रति सम्मान व्यक्त करना, उनके आदर्शों और बलिदानों की स्मृति को जीवित रखना तथा नई पीढ़ी को प्रेरणा देना।
(ख) किसकी मूर्ति: (विद्यार्थी अपने विवेक से उत्तर दें — जैसे महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर या किसी स्थानीय समाजसेवी की, ताकि उनके आदर्श समाज को प्रेरित करें।)
(ग) उत्तरदायित्व: मूर्ति की स्वच्छता व रख-रखाव बनाए रखना, उसका अपमान न होने देना और उससे जुड़े आदर्शों का पालन करना हमारा कर्तव्य है।
प्र.9 (रचनात्मक): देश-प्रेम केवल सीमा पर तैनात फ़ौजी ही नहीं दिखाते; हम भी अपने दैनिक कार्यों में देश-प्रेम प्रकट कर सकते हैं — जैसे सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान न पहुँचाना, पर्यावरण संरक्षण, सफ़ाई रखना, ईमानदारी से कर चुकाना आदि। (विद्यार्थी ऐसे कार्यों का उल्लेख कर उन पर अमल करें।)
प्र.10 — स्थानीय बोली के वाक्यों को मानक हिंदी में लिखिए: “कोई गिराक आ गया समझो। उसको चौड़े चौखट चाहिए। तो कैप्टन किदर से लाएगा? तो उसको मूर्तिवाला दे दिया। उदर दूसरा बिठा दिया।” → मानक हिंदी: “मान लीजिए कोई ग्राहक आ गया। उसे चौड़े फ्रेम की आवश्यकता है। तो कैप्टन कहाँ से लाएगा? तब उसने मूर्ति वाला फ्रेम दे दिया और मूर्ति पर दूसरा फ्रेम लगा दिया।”
प्र.11 — “भई खूब! क्या आइडिया है!” — एक भाषा में दूसरी भाषा के शब्दों के लाभ: इससे भाषा सरल, रोचक व जीवंत बनती है, अभिव्यक्ति में सहजता आती है और भाषा अधिक समृद्ध एवं व्यापक हो जाती है।
9. ध्यान देने योग्य बातें व त्वरित पुनरावृत्ति
ध्यान देने योग्य बातें:
- कहानी की विधा गद्य (कहानी) है; लेखक स्वयं प्रकाश हैं — परीक्षा में लेखक का नाम न भूलें।
- कैप्टन कभी प्रत्यक्ष रूप से कहानी में नहीं आता, फिर भी वह नायक है — यह कथा-शिल्प की विशेषता है।
- ‘चश्मा’ केवल वस्तु नहीं, देशभक्त दृष्टि का प्रतीक है।
- सरकंडे का चश्मा = देशभक्ति की निरंतरता का प्रतीक।
- कहानी किस्सागोई शैली में, सरल व रोचक भाषा में लिखी गई है।
त्वरित पुनरावृत्ति:
- लेखक — स्वयं प्रकाश (जन्म 1947, इंदौर; निधन 2019)।
- मुख्य पात्र — कैप्टन, हालदार साहब, पानवाला, मास्टर मोतीलाल।
- मूर्ति — नेताजी सुभाषचंद्र बोस की, संगमरमर की, ड्राइंग मास्टर मोतीलाल द्वारा बनाई।
- कमी — पत्थर का चश्मा नहीं बन पाया; कैप्टन उसे असली चश्मे से पूरा करता रहा।
- मूल भाव — आम आदमी की निस्वार्थ देशभक्ति।
- प्रेमचंद
- स्वयं प्रकाश
- यशपाल
- मन्नू भंडारी
- हर सप्ताह
- हर महीने
- हर पंद्रहवें दिन
- हर दिन
- महात्मा गांधी
- भगत सिंह
- नेताजी सुभाषचंद्र बोस
- जवाहरलाल नेहरू
- काँसे की
- संगमरमर की
- मिट्टी की
- लकड़ी की
- मास्टर मोतीलाल को
- कैप्टन को
- पानवाले को
- हालदार साहब को
- टोपी नहीं थी
- संगमरमर का चश्मा था, असली नहीं
- वर्दी नहीं थी
- मूर्ति छोटी थी
- पानवाला
- मास्टर मोतीलाल
- कैप्टन चश्मेवाला
- नगरपालिका
- फ़ौजी कैप्टन
- आज़ाद हिंद फ़ौज का सिपाही
- बूढ़ा, लँगड़ा चश्मे का फेरीवाला
- स्कूल का मास्टर
- ड्राइवर ने
- पानवाले ने
- मास्टर मोतीलाल ने
- नगरपालिका अधिकारी ने
- सोने का
- काँच का
- सरकंडे का
- प्लास्टिक का
- मास्टर
- नेताजी
- कैप्टन
- साहब
- व्यापार का महत्त्व
- आम आदमी की निस्वार्थ देशभक्ति
- मूर्ति-कला
- नगरपालिका की कार्यप्रणाली
- 1947, इंदौर
- 1950, जयपुर
- 1947, दिल्ली
- 1942, भोपाल
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