- यह पाठ एक रेखाचित्र (शब्द-चित्र) है, जिसके लेखक हैं रामवृक्ष बेनीपुरी — जिन्हें ‘कलम का जादूगर’ कहा जाता है।
- बालगोबिन भगत गृहस्थ होकर भी सच्चे साधु थे — कबीर के अनुयायी, सत्यवादी, खरा व्यवहार रखने वाले और परिश्रमी किसान।
- उनका जीवन-दर्शन कर्म, सत्य, सादगी और संगीत-साधना पर टिका था; खेत में पैदा हर चीज़ पहले ‘साहब’ (कबीर/ईश्वर) के दरबार में अर्पित करते थे।
- पाठ में बेटे की मृत्यु का मार्मिक प्रसंग है, जहाँ भगत शोक के बजाय उत्सव मनाते हैं — आत्मा का परमात्मा से मिलन मानकर। यही उनका मृत्यु पर विजय पाने वाला विश्वास है।
- पाठ सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करता है — वे पतोहू (विधवा बहू) का पुनर्विवाह कराते हैं।
- बोर्ड महत्त्व: लगभग ~4 अंक/वर्ष — प्रायः चरित्र-चित्रण, मधुर गायन का शब्द-चित्र, या कबीर पर श्रद्धा पर आधारित प्रश्न।
1. लेखक परिचय — रामवृक्ष बेनीपुरी
जन्म: सन् 1899, बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के बेनीपुर गाँव में। माता-पिता का निधन बचपन में ही हो जाने के कारण उनके जीवन के आरंभिक वर्ष अभावों, कठिनाइयों और संघर्षों में बीते।
शिक्षा व राष्ट्रीय आंदोलन: दसवीं तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे सन् 1920 में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ गए। कई बार जेल भी गए। निधन: सन् 1968 में हुआ।
पत्रकारिता: मात्र 15 वर्ष की अवस्था में ही उनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं। वे बेहद प्रतिभाशाली पत्रकार थे और उन्होंने अनेक दैनिक, साप्ताहिक एवं मासिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया — जिनमें तरुण भारत, किसान मित्र, बालक, युवक, योगी, जनता, जनवाणी और नयी धारा उल्लेखनीय हैं।
रचनाएँ (विविध विधाएँ): गद्य की अनेक विधाओं में उनका लेखन व्यापक है। उनका पूरा साहित्य बेनीपुरी रचनावली के आठ खंडों में प्रकाशित है। प्रमुख रचनाएँ —
- पतितों के देश में — उपन्यास
- चिता के फूल — कहानी
- अंबपाली — नाटक
- माटी की मूरतें — रेखाचित्र (इसी संग्रह से यह पाठ लिया गया है)
- पैरों में पंख बाँधकर — यात्रा-वृत्तांत
- जंजीरें और दीवारें — संस्मरण
विशेषता: उनकी रचनाओं में स्वाधीनता की चेतना, मनुष्यता की चिंता और इतिहास की युगानुरूप व्याख्या मिलती है। विशिष्ट शैलीकार होने के कारण उन्हें ‘कलम का जादूगर’ कहा जाता है।
2. विधा परिचय — रेखाचित्र क्या है
‘बालगोबिन भगत’ एक रेखाचित्र है। रेखाचित्र वह गद्य विधा है जिसमें लेखक शब्दों की कुछ ही रेखाओं से किसी व्यक्ति, घटना या वातावरण का सजीव चित्र खींच देता है — ठीक जैसे चित्रकार कुछ रेखाओं से आकृति उभार देता है। इसमें कल्पना कम, यथार्थ अधिक होता है।
इस रेखाचित्र के माध्यम से लेखक ने एक ऐसे विलक्षण चरित्र का उद्घाटन किया है जो मनुष्यता, लोक संस्कृति और सामूहिक चेतना का प्रतीक है। पाठ का मूल संदेश — वेशभूषा या बाह्य अनुष्ठानों से कोई संन्यासी नहीं होता; संन्यास का आधार जीवन के मानवीय सरोकार होते हैं। बालगोबिन भगत इसी आधार पर लेखक को साधु लगते हैं। साथ ही यह पाठ सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करता है और इसमें ग्रामीण जीवन की सजीव झाँकी देखने को मिलती है।
3. पाठ का विस्तृत सार
रूप-रंग व वेशभूषा: बालगोबिन भगत मँझोले कद के गोरे-चिट्टे आदमी थे, उम्र साठ से ऊपर, बाल पक चुके थे। लंबी दाढ़ी या जटाजूट तो नहीं रखते थे, किंतु चेहरा सफ़ेद बालों से जगमगाता रहता। कपड़े बहुत कम पहनते — कमर में एक लँगोटी और सिर पर कबीरपंथियों की-सी कनफटी टोपी। जाड़े में ऊपर से एक काली कमली ओढ़ लेते। माथे पर रामानंदी चंदन का चमकता तिलक और गले में तुलसी की जड़ों की बेडौल माला बाँधे रहते।
गृहस्थ फिर भी साधु: वे साधु की पारंपरिक छवि वाले नहीं थे — बिलकुल गृहस्थ थे। थोड़ी खेतीबारी थी, एक साफ़-सुथरा मकान था, पत्नी (गृहिणी), बेटा और पतोहू थे। फिर भी वे साधु की सब परिभाषाओं में खरे उतरते थे।
कबीर के अनुयायी: वे कबीर को ‘साहब’ मानते थे, उन्हीं के गीत गाते, उन्हीं के आदेशों पर चलते। कभी झूठ नहीं बोलते, खरा व्यवहार रखते। किसी से दो-टूक बात करने में संकोच नहीं करते, न किसी से ख़ामख़ाह झगड़ा मोल लेते। किसी की चीज़ नहीं छूते, न बिना पूछे व्यवहार में लाते। इस नियम को इतनी बारीकी तक निभाते कि लोग कुतूहल करते — कभी दूसरे के खेत में शौच तक नहीं जाते।
सब कुछ ‘साहब’ का: उनकी हर चीज़ ‘साहब’ की थी। खेत में जो भी पैदा होता, उसे सिर पर लादकर पहले चार कोस दूर स्थित कबीरपंथी मठ (साहब के दरबार) में ‘भेंट’ रूप में अर्पित करते। वहाँ से जो ‘प्रसाद’ रूप में मिलता, उसी से अपना घर चलाते।
मधुर गायन: लेखक उनके मधुर गान पर मुग्ध थे। कबीर के सीधे-सादे पद उनके कंठ से निकलकर सजीव हो उठते। आषाढ़ में रोपनी के समय कीचड़ में लथपथ खेत में रोपते हुए जब वे गाते, तो उनका कंठ संगीत के स्वर्ग की ओर उठता; बच्चे झूम उठते, औरतें गुनगुनाने लगतीं, हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते, रोपनी करने वालों की अँगुलियाँ एक अजीब क्रम से चलने लगतीं। भादो की अँधेरी आधी रात में, मूसलाधार वर्षा के बीच, उनकी खँजड़ी डिमक-डिमक बजती और वे गाते — “गोदी में पियवा, चमक उठे सखिया, चिहुँक उठे ना!”
प्रभाती और संझा: कार्तिक आते ही वे प्रभातियाँ (प्रातःकाल के गीत) गाने लगते, जो फागुन तक चलतीं। सबेरे नदी-स्नान कर पोखर के ऊँचे भिंडे पर खँजड़ी लेकर गाते। माघ की कड़कड़ाती ठंड में भी, कुश की चटाई पर पूरब-मुख बैठकर वे गाते रहते। गर्मियों में अपने घर के आँगन में ‘संझा’ (साँझ के गीत) गाते — गाँव के प्रेमी जुटते, खँजड़ी और करताल बजते, स्वर ऊँचा होता और बालगोबिन भगत व श्रोता दोनों नाच उठते; सारा आँगन नृत्य और संगीत से ओतप्रोत हो जाता।
बेटे की मृत्यु का प्रसंग: उनका इकलौता बेटा कुछ सुस्त और बोदा (कम बुद्धि वाला) था, इसी कारण भगत उसे और भी अधिक प्यार करते थे। बड़ी साध से उसकी शादी कराई — पतोहू बड़ी सुभग और सुशील मिली। एक दिन वह बेटा बीमार होकर मर गया। लेखक भगत के घर गए तो दंग रह गए — भगत बेटे के शव के सामने ज़मीन पर आसन जमाए गीत गाए जा रहे थे! वही पुराना स्वर, वही तल्लीनता। वे पतोहू को रोने के बदले उत्सव मनाने को कहते — “आत्मा परमात्मा के पास चली गई, विरहिनी अपने प्रेमी से जा मिली; इससे बढ़कर आनंद की क्या बात?” यह उनका वह चरम विश्वास था जो मृत्यु पर भी विजयी होता है।
रूढ़ि-विरोध — पतोहू का पुनर्विवाह: श्राद्ध की अवधि पूरी होते ही भगत ने पतोहू के भाई को बुलाकर आदेश दिया कि वह अपनी बहन की दूसरी शादी करा दे। पतोहू रो-रोकर कहती रही कि वह बुढ़ापे में भगत की सेवा करेगी, पर भगत का निर्णय अटल था — “तू जा, नहीं तो मैं ही यह घर छोड़कर चल दूँगा।” इस तरह उन्होंने सामाजिक रूढ़ि तोड़कर विधवा-पुनर्विवाह कराया।
भगत की मृत्यु: उनकी मृत्यु भी उन्हीं के अनुरूप हुई। वे हर वर्ष गंगा-स्नान करने जाते — करीब तीस कोस दूर — और पैदल ही जाते-आते, रास्ते भर खँजड़ी बजाते, गाते, माँगकर नहीं बल्कि घर से खाकर निकलते। इस बार लौटे तो तबीयत सुस्त थी, हल्का बुखार रहने लगा, पर वे नेम-व्रत (दिनचर्या, स्नान, गायन, खेतीबारी) नहीं छोड़ते थे। लोगों के मना करने पर भी हँसकर टाल देते। उस दिन भी संध्या में गीत गाए, किंतु मालूम होता जैसे तागा टूट गया हो, माला का एक-एक दाना बिखरा हो। भोर में लोगों ने गीत नहीं सुना — जाकर देखा तो बालगोबिन भगत नहीं रहे, सिर्फ़ उनका पंजर (शरीर) पड़ा था।
4. बालगोबिन भगत का चरित्र-चित्रण
- गृहस्थ साधु: घर-परिवार और खेती रखते हुए भी वे साधु की सब परिभाषाओं में खरे थे — सच्चा संन्यास बाह्य वेश में नहीं, आचरण में है।
- सत्यवादी व खरे: कभी झूठ नहीं बोलते, खरा व्यवहार रखते, दो-टूक बात करने में संकोच नहीं करते।
- परोपकारी व निर्लोभ: किसी की चीज़ बिना पूछे नहीं छूते, न झगड़ा मोल लेते। हर पैदावार पहले साहब को अर्पित करते।
- परिश्रमी किसान: कीचड़ में लथपथ होकर स्वयं रोपनी करते — श्रम और साधना दोनों साथ चलते।
- संगीत-साधक: ऋतु-ऋतु में गाते — रोपनी के गीत, प्रभाती, संझा। संगीत उनकी ईश्वर-भक्ति का माध्यम था।
- दृढ़ व अटल: बेटे की मृत्यु और पतोहू-पुनर्विवाह में उनका निर्णय अडिग रहा।
- आदर्शवादी व सुधारक: रूढ़ियों से ऊपर उठकर विधवा-विवाह कराया; मोह को प्रेम में बदलकर मृत्यु को उत्सव माना।
5. उनकी दिनचर्या व कबीरपंथी विचारधारा
दिनचर्या (ऋतु-अनुसार संगीत-साधना):
- आषाढ़ (रोपनी): खेत में रोपनी करते हुए मधुर गायन — पूरा गाँव झूम उठता।
- भादो (वर्षा-रात): अँधेरी आधी रात में खँजड़ी बजाकर गाते।
- कार्तिक से फागुन (प्रभाती): सबेरे नदी-स्नान कर पोखर के भिंडे पर प्रभातियाँ गाते।
- माघ (कड़ाके की ठंड): कुश की चटाई पर पूरब-मुख बैठकर ठिठुरते हुए भी गाते।
- गर्मी (संझा): घर के आँगन में प्रेमी-मंडली के साथ संझा गाते और नाचते।
कबीरपंथी विचारधारा: भगत कबीर को अपना ‘साहब’ (गुरु/ईश्वर) मानते थे। कबीर के निर्गुण-भक्ति दर्शन के अनुरूप वे — सत्य, सादगी, बाह्य आडंबर से दूरी, कर्म-निष्ठा और आत्मा-परमात्मा के मिलन में विश्वास रखते थे। मृत्यु को वे आत्मा का परमात्मा से मिलन मानते थे, इसलिए शोक नहीं, उत्सव मनाते थे। निर्लोभ भाव से अपनी समस्त पैदावार साहब के दरबार में अर्पित कर देना उनकी इसी विचारधारा का प्रमाण है।
6. भाषा-शैली
- चित्रात्मक शैली: लेखक शब्दों से सजीव चित्र खींचते हैं — रोपनी और प्रभात के दृश्य आँखों के सामने उतर आते हैं।
- सरल, प्रवाहमयी खड़ी बोली के साथ तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों का सुंदर मेल — पतोहू, खँजड़ी, कलेवा, अधरतिया, पुरवाई आदि लोक-शब्द।
- संगीतात्मकता व लय: गीतों के उद्धरण और ध्वन्यात्मक शब्द (डिमक-डिमक, टर्र-टर्र) भाषा में संगीत भर देते हैं।
- भावात्मक व मार्मिक स्पर्श: बेटे की मृत्यु का प्रसंग पाठक के हृदय को छू जाता है।
- छोटे, सटीक व उद्गारवाचक वाक्य भाव को तीव्रता देते हैं।
7. महत्त्वपूर्ण प्रसंग
आषाढ़ की रिमझिम में समूचा गाँव खेतों में उतरा है। कीचड़ में लथपथ बालगोबिन भगत रोपनी करते हुए गाते हैं। उनका कंठ एक-एक शब्द को संगीत के स्वर्ग की ओर उठा देता है — बच्चे झूमते हैं, औरतें गुनगुनाती हैं, हलवाहों के पैर ताल पर उठते हैं। यह प्रसंग दिखाता है कि भगत का संगीत श्रम को भी उत्सव बना देता था।
इकलौते बेटे के शव के सामने भगत रोने के बजाय गीत गा रहे हैं और पतोहू को भी उत्सव मनाने को कहते हैं — “आत्मा परमात्मा के पास चली गई, विरहिनी अपने प्रेमी से जा मिली।” यह प्रसंग उनके मृत्यु-पर-विजयी विश्वास और कबीरपंथी दर्शन को उजागर करता है।
श्राद्ध के बाद भगत पतोहू के भाई को बुलाकर उसकी दूसरी शादी कराने का अटल आदेश देते हैं, यह कहते हुए कि नहीं तो वे स्वयं घर छोड़ देंगे। यह प्रसंग उनके रूढ़ि-विरोधी, प्रगतिशील व्यक्तित्व को सिद्ध करता है।
अंतिम संध्या में गाते हुए लगा जैसे तागा टूट गया, माला का दाना बिखर गया; भोर में गीत न सुनकर लोगों ने पाया कि भगत नहीं रहे। यह प्रसंग दिखाता है कि उनकी मृत्यु भी उनके संगीतमय, साधक जीवन के अनुरूप शांत और मौन थी।
8. कठिन शब्दार्थ (शब्द-संपदा)
- मँझोला — न बहुत बड़ा, न बहुत छोटा
- कमली — कंबल
- पतोहू — पुत्रवधू / पुत्र की स्त्री
- रोपनी — धान की रोपाई
- कलेवा — सवेरे का जलपान
- पुरवाई — पूरब की ओर से बहने वाली हवा
- अधरतिया — आधी रात
- खँजड़ी — ढपली के ढंग का परंतु आकार में छोटा वाद्य यंत्र
- निस्तब्धता — सन्नाटा
- लोही — प्रातःकाल की लालिमा
- कुहासा — कोहरा
- आवृत — ढका हुआ, आच्छादित
- कुश — एक प्रकार की नुकीली घास
- बोदा — कम बुद्धि वाला
- संबल — सहारा
- रामानंदी चंदन — माथे पर लगाया जाने वाला विशेष तिलक
9. मुख्य भाव (केंद्रीय संदेश)
यह रेखाचित्र संदेश देता है कि सच्चा संन्यास या साधुता बाह्य वेशभूषा और आडंबर में नहीं, बल्कि मनुष्य के आचरण, सत्य, परिश्रम और मानवीय सरोकारों में निहित है। बालगोबिन भगत गृहस्थ होकर भी सच्चे साधु हैं — क्योंकि उनका जीवन कबीर के दर्शन, कर्म और प्रेम पर आधारित है। पाठ रूढ़ियों (जैसे विधवा-जीवन का अंधकार) पर प्रहार करता है और बताता है कि मोह को प्रेम में बदलकर मनुष्य मृत्यु पर भी विजय पा सकता है। साथ ही यह ग्राम्य संस्कृति और लोक-संगीत की जीवंत झाँकी प्रस्तुत करता है।
10. NCERT प्रश्न-अभ्यास — सभी उत्तर
प्रश्न 1. खेतीबारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे?
उत्तर: बालगोबिन भगत निम्न विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे — (i) वे कभी झूठ नहीं बोलते, खरा व्यवहार रखते थे; (ii) किसी से बिना पूछे उसकी चीज़ नहीं छूते थे, यहाँ तक कि दूसरे के खेत में शौच तक नहीं जाते थे; (iii) किसी से व्यर्थ झगड़ा नहीं करते थे; (iv) कबीर को ‘साहब’ मानकर उनके आदर्शों पर चलते थे; (v) निर्लोभ भाव से अपनी समस्त पैदावार पहले साहब के दरबार में अर्पित करते थे। इस प्रकार वे साधु की सब परिभाषाओं में खरे उतरते थे।
प्रश्न 2. भगत की पुत्रवधू उन्हें अकेले क्यों नहीं छोड़ना चाहती थी?
उत्तर: पुत्रवधू भगत के बुढ़ापे को लेकर चिंतित थी। वह सोचती थी कि इस बुढ़ापे में भगत के लिए भोजन कौन बनाएगा और बीमार पड़ने पर उन्हें एक चुल्लू पानी भी कौन देगा। वह उनकी सेवा करना चाहती थी, इसलिए रो-रोकर कहती थी कि वह उन्हें अकेला छोड़कर नहीं जाएगी।
प्रश्न 3. भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाओं को किस तरह व्यक्त कीं?
उत्तर: भगत ने बेटे की मृत्यु पर शोक के बजाय उत्सव मनाया। वे शव के सामने ज़मीन पर आसन जमाकर गीत गाते रहे और पतोहू को रोने के बदले उत्सव मनाने को कहा। उनका मानना था कि आत्मा परमात्मा के पास चली गई है, विरहिनी अपने प्रेमी से जा मिली है — इससे बढ़कर आनंद की और क्या बात हो सकती है। इस प्रकार उन्होंने मृत्यु पर विजयी विश्वास को व्यक्त किया।
प्रश्न 4. भगत के व्यक्तित्व और उनकी वेशभूषा का अपने शब्दों में चित्र प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: बालगोबिन भगत मँझोले कद के गोरे-चिट्टे, साठ से ऊपर के व्यक्ति थे, जिनके बाल पक चुके थे। वे लंबी दाढ़ी या जटा नहीं रखते थे। कपड़े बहुत कम पहनते — कमर में लँगोटी और सिर पर कबीरपंथियों जैसी कनफटी टोपी। जाड़े में ऊपर से काली कमली ओढ़ लेते। माथे पर रामानंदी चंदन का चमकता तिलक और गले में तुलसी की जड़ों की बेडौल माला रहती। उनका व्यक्तित्व सरल, सच्चा, परिश्रमी और संगीतमय था।
प्रश्न 5. बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के अचरज का कारण क्यों थी?
उत्तर: भगत की दिनचर्या अचरज का कारण इसलिए थी क्योंकि वे गृहस्थ होकर भी साधु जैसा कठोर अनुशासित जीवन जीते थे। हर मौसम में — कड़ाके की ठंड, भादो की बरसाती रात या तपती गर्मी — वे अपने नियम (नेम-व्रत), स्नान, गायन और खेतीबारी नहीं छोड़ते थे। माघ की ठिठुरन में भी पोखर पर जाकर गाते। बुढ़ापे और बीमारी में भी उन्होंने यह दिनचर्या नहीं बदली, इसी दृढ़ता पर लोग आश्चर्यचकित होते थे।
प्रश्न 6. पाठ के आधार पर बालगोबिन भगत के मधुर गायन की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: भगत का गायन इतना मधुर और प्रभावशाली था कि सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते थे। रोपनी के समय उनके गीत से बच्चे झूम उठते, औरतें गुनगुनाने लगतीं और हलवाहों के पैर ताल पर थिरकने लगते। उनका कंठ शब्दों को संगीत के स्वर्ग की ओर उठा देता। वे गाते-गाते इतने मस्त और सुरूर में आ जाते कि शरीर की सुध-बुध भूल जाते। संझा के समय गाते हुए वे और श्रोता दोनों नाच उठते — सारा वातावरण संगीतमय हो जाता।
प्रश्न 7. कुछ मार्मिक प्रसंगों के आधार पर यह दिखाई देता है कि बालगोबिन भगत प्रचलित सामाजिक मान्यताओं को नहीं मानते थे। पाठ के आधार पर उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: (i) बेटे की मृत्यु पर शोक करने की रूढ़ि के विपरीत उन्होंने उत्सव मनाया और गीत गाए। (ii) सबसे बड़ा प्रसंग — श्राद्ध की अवधि पूरी होते ही उन्होंने अपनी विधवा पतोहू की दूसरी शादी (पुनर्विवाह) का आदेश दिया, जबकि उस समय विधवा-विवाह को समाज स्वीकार नहीं करता था। पतोहू के रोकने पर भी वे अपने निर्णय पर अटल रहे। ये प्रसंग सिद्ध करते हैं कि वे प्रचलित रूढ़ियों के बंधन में नहीं बँधे थे।
प्रश्न 8. धान की रोपाई के समय समूचे माहौल को भगत की स्वर लहरियाँ किस तरह चमत्कृत कर देती थीं? उस माहौल का शब्द-चित्र प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: आषाढ़ की रिमझिम में समूचा गाँव खेतों में उतर पड़ता है — कहीं हल चल रहे हैं, कहीं रोपनी हो रही है, धान के पानी-भरे खेतों में बच्चे उछल रहे हैं और औरतें कलेवा लेकर मेड़ पर बैठी हैं। आसमान बादलों से घिरा है, ठंडी पुरवाई बह रही है। ऐसे में बालगोबिन भगत कीचड़ में लथपथ रोपनी करते हुए गाते हैं। उनका कंठ एक-एक शब्द को संगीत के स्वर्ग की ओर उठा देता है — बच्चे झूम उठते हैं, औरतों के होंठ काँपकर गुनगुनाने लगते हैं, हलवाहों के पैर ताल पर उठने लगते हैं और रोपनी करने वालों की अँगुलियाँ एक अजीब क्रम से चलने लगती हैं। पूरा वातावरण संगीत के जादू से चमत्कृत हो उठता है।
प्रश्न 9. (रचना और अभिव्यक्ति) पाठ के आधार पर बताएँ कि बालगोबिन भगत की कबीर पर श्रद्धा किन-किन रूपों में प्रकट हुई है?
उत्तर: भगत की कबीर पर श्रद्धा कई रूपों में प्रकट हुई — (i) वे कबीर को ‘साहब’ मानते थे; (ii) निरंतर उन्हीं के पद गाते थे; (iii) उन्हीं के बताए आदर्शों — सत्य, सादगी, निर्लोभ — पर चलते थे; (iv) अपनी समस्त पैदावार पहले कबीरपंथी मठ (साहब के दरबार) में अर्पित करते; (v) मृत्यु को आत्मा-परमात्मा का मिलन मानने का उनका दर्शन भी कबीर से ही प्रेरित था।
प्रश्न 10. आपकी दृष्टि में भगत की कबीर पर अगाध श्रद्धा के क्या कारण रहे होंगे?
उत्तर: कबीर का निर्गुण-भक्ति दर्शन सरल, आडंबर-रहित और मानवता पर आधारित था, जो भगत के स्वभाव से पूरी तरह मेल खाता था। कबीर का सत्य, समानता, कर्म और बाह्य-आडंबर के विरोध का संदेश भगत को अपने जीवन-मूल्यों का आधार लगा। यही कारण है कि उन्होंने कबीर को गुरु रूप में अपनाकर उन पर अगाध श्रद्धा रखी। (विद्यार्थी अपने शब्दों में लिख सकते हैं।)
प्रश्न 11. गाँव का सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश आषाढ़ चढ़ते ही उल्लास से क्यों भर जाता है?
उत्तर: आषाढ़ में वर्षा आने से खेती का काम शुरू होता है, जो गाँव की समृद्धि और जीवन का आधार है। पूरा गाँव हल चलाने, रोपनी करने में जुट जाता है; बच्चे पानी-भरे खेतों में खेलते हैं, औरतें गीत गाती हैं। नई फ़सल की आशा और सामूहिक श्रम का उत्साह सारे परिवेश को उल्लास से भर देता है। भगत का संगीत इस उल्लास को और बढ़ा देता है।
प्रश्न 12. “ऊपर की तस्वीर से यह नहीं माना जाए कि बालगोबिन भगत साधु थे।” क्या ‘साधु’ की पहचान पहनावे के आधार पर की जानी चाहिए? आप किन आधारों पर यह सुनिश्चित करेंगे कि अमुक व्यक्ति ‘साधु’ है?
उत्तर: नहीं, साधु की पहचान केवल पहनावे या बाह्य वेश से नहीं की जानी चाहिए। साधु की असली पहचान उसके आचरण से होती है — सत्य बोलना, खरा व्यवहार रखना, निर्लोभ रहना, किसी का अहित न करना, परिश्रमी होना और मानवीय मूल्यों पर चलना। बालगोबिन भगत साधु-वेश में नहीं थे, फिर भी इन्हीं गुणों के कारण सच्चे साधु थे। अतः साधुता वेश में नहीं, आचरण में है।
प्रश्न 13. मोह और प्रेम में अंतर होता है। भगत के जीवन की किस घटना के आधार पर इस कथन का सच सिद्ध करेंगे?
उत्तर: मोह में स्वार्थ और बंधन होता है, जबकि प्रेम में त्याग और मुक्ति। बेटे की मृत्यु पर भगत मोह में बँधकर रोते नहीं, बल्कि उसे प्रेम से परमात्मा को अर्पित मानकर उत्सव मनाते हैं। आगे विधवा पतोहू के प्रति मोह न रखकर, प्रेमपूर्वक उसके भविष्य के लिए उसका पुनर्विवाह करा देते हैं — भले ही इससे वे अकेले हो जाएँ। ये घटनाएँ सिद्ध करती हैं कि भगत में मोह नहीं, सच्चा निःस्वार्थ प्रेम था।
प्रश्न 14. (भाषा-अध्ययन) इस पाठ में आए कोई दस क्रियाविशेषण छाँटकर लिखिए और उनके भेद भी बताइए।
उत्तर: उदाहरण — (i) हमेशा (कालवाचक), (ii) बिलकुल (परिमाणवाचक), (iii) कभी-कभी (कालवाचक), (iv) धीरे-धीरे (रीतिवाचक), (v) ऊपर (स्थानवाचक), (vi) बार-बार (कालवाचक), (vii) इतनी (परिमाणवाचक), (viii) अचानक/अकस्मात (कालवाचक), (ix) पहले (कालवाचक), (x) यहाँ-वहाँ/नीचे (स्थानवाचक)।
11. ध्यान देने योग्य बातें
- विधा अवश्य याद रखें — यह रेखाचित्र है, कहानी नहीं; संग्रह माटी की मूरतें।
- भगत ‘साहब’ अर्थात कबीर को मानते थे — यह न भूलें।
- ऋतुओं का क्रम याद रखें — आषाढ़ (रोपनी) → भादो → कार्तिक-फागुन (प्रभाती) → माघ → गर्मी (संझा)।
- दो प्रमुख रूढ़ि-विरोधी प्रसंग — बेटे की मृत्यु पर उत्सव, और पतोहू का पुनर्विवाह।
- उत्तर में पाठ के मार्मिक प्रसंग और भगत के गुणों का उल्लेख अवश्य करें।
त्वरित पुनरावृत्ति: लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी (कलम का जादूगर) → विधा रेखाचित्र → भगत गृहस्थ किंतु सच्चे साधु → कबीर के अनुयायी → मधुर गायन (रोपनी, प्रभाती, संझा) → बेटे की मृत्यु पर उत्सव → पतोहू का पुनर्विवाह → मृत्यु संगीतमय जीवन के अनुरूप → संदेश: साधुता आचरण में, रूढ़ियों पर प्रहार।
- महावीर प्रसाद द्विवेदी
- रामवृक्ष बेनीपुरी
- यशपाल
- निदा फ़ाज़ली
- कहानी
- निबंध
- रेखाचित्र
- संस्मरण
- तुलसीदास
- सूरदास
- कबीर
- रैदास
- गाँधी टोपी
- कबीरपंथियों जैसी कनफटी टोपी
- ऊनी टोपी
- कोई टोपी नहीं
- बाज़ार में बेचने
- साहब (कबीर) के दरबार/मठ में भेंट रूप में
- अपने घर के भंडार में
- ज़मींदार के पास
- ढोल
- हारमोनियम
- खँजड़ी
- बाँसुरी
- तेज़ बुद्धि का
- सुस्त और बोदा (कम बुद्धि वाला)
- बहुत चतुर
- संगीतकार
- विलाप किया
- गाँव छोड़ दिया
- शोक के बदले उत्सव मनाया और गीत गाए
- मौन धारण कर लिया
- उसे घर में रखा
- उसकी दूसरी शादी (पुनर्विवाह) कराने का आदेश दिया
- उसे मायके भेज दिया
- उसे संन्यास दिलाया
- संझा
- प्रभाती
- होली
- विवाह गीत
- पत्नी
- पुत्री
- पुत्रवधू
- बहन
- राष्ट्रकवि
- कलम का जादूगर
- महाकवि
- कविवर
- दस कोस
- तीस कोस
- चार कोस
- सौ कोस
- चिता के फूल
- माटी की मूरतें
- अंबपाली
- पैरों में पंख बाँधकर
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