- यह मधु कांकरिया का लिखा एक यात्रा-वृत्तांत है, जिसमें लेखिका की सिक्किम (गंगटोक → यूमथांग → कटाओ) की रोमांचक यात्रा का सजीव वर्णन है।
- शीर्षक ‘साना-साना हाथ जोड़ि’ एक नेपाली प्रार्थना की पंक्ति है, जिसका अर्थ है — छोटे-छोटे हाथ जोड़कर प्रार्थना करना कि पूरा जीवन अच्छाइयों को समर्पित हो।
- पाठ का मूल स्वर प्रकृति-सौंदर्य, पर्यावरण-चेतना, आस्था और श्रम का सम्मान है — हिमालय लेखिका के लिए केवल कविता नहीं, दर्शन बन जाता है।
- लेखिका सीमा पर तैनात सैनिकों और पहाड़ी मेहनतकश स्त्रियों-बच्चों के कठोर जीवन-संघर्ष को भी संवेदना के साथ उठाती हैं।
- परीक्षा-महत्त्व: लगभग 4 अंक/वर्ष — प्रायः 1 लघु-उत्तरीय व 1 निबंधात्मक प्रश्न (प्रकृति-वर्णन, श्रम-सौंदर्य या पर्यावरण-संदेश पर)।
1. लेखिका परिचय (मधु कांकरिया)
मधु कांकरिया समकालीन हिंदी की एक सशक्त कथाकार और यात्रा-लेखिका हैं। इनका जन्म सन् 1957 में कोलकाता (कलकत्ता) में हुआ। इन्होंने अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर तथा कंप्यूटर एप्लीकेशन में डिप्लोमा किया है।
इनकी प्रमुख रचनाओं में उपन्यास ‘खुले गगन के लाल सितारे’, ‘सलाम आखिरी’, ‘पत्ताखोर’ तथा कहानी-संग्रह ‘बीतते हुए’ व ‘और अंत में यीशु’ शामिल हैं।
मधु कांकरिया का लेखन सामाजिक सरोकारों, जीवन के संघर्षों और मनुष्य की पीड़ा से गहराई से जुड़ा है। प्रस्तुत यात्रा-वृत्तांत में भी वे केवल सुंदर दृश्यों का बखान नहीं करतीं, बल्कि उस सौंदर्य के पीछे छिपे मेहनतकश लोगों के संघर्ष और पर्यावरण की चिंता को भी पाठक के सामने रखती हैं। उनकी भाषा भावमयी, चित्रात्मक और चिंतनशील है।
2. यात्रा-वृत्तांत का विस्तृत सार (गंगटोक, यूमथांग)
गंगटोक — मेहनतकश बादशाहों का शहर: यात्रा का आरंभ गंगटोक से होता है। रात में लेखिका को आसमान उलटा पड़ा-सा लगता है — ढलान पर बिखरे तारे ऐसे टिमटिमाते हैं मानो रोशनी की झालर बना रहे हों। यह जगमगाता शहर लेखिका को सम्मोहित कर देता है। वे इसे ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ कहती हैं, क्योंकि यहाँ के लोगों ने कठोर परिश्रम से इस पहाड़ी नगर को संवारा है। उसी रात लेखिका ने एक नेपाली युवती से प्रार्थना के बोल सीखे — ‘साना-साना हाथ जोड़ि’ (छोटे-छोटे हाथ जोड़कर प्रार्थना)।
यूमथांग की ओर: सुबह लेखिका गंगटोक से 149 किलोमीटर दूर यूमथांग के लिए निकलती हैं। ड्राइवर-कम-गाइड जितेन नार्गे रास्ते भर बातें बताता चलता है। बादलों के कारण कंचनजंघा (हिमालय की तीसरी सबसे ऊँची चोटी) नहीं दिखती, पर रंग-बिरंगे फूलों ने भरपाई कर दी।
रास्ते के दृश्य: रास्ते में श्वेत बौद्ध पताकाएँ दिखती हैं — किसी बौद्ध की मृत्यु पर शांति हेतु 108 श्वेत पताकाएँ फहराई जाती हैं, जिन्हें कभी उतारा नहीं जाता; नए कार्य के शुभारंभ पर रंगीन पताकाएँ लगाई जाती हैं। एक कुटिया में धर्म-चक्र (प्रेअर व्हील) घूमता दिखता है — मान्यता है कि इसे घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं। यहीं लेखिका को बोध होता है कि मैदान हो या पहाड़ — इस देश की आत्मा एक-सी है।
हिमालय का विराट रूप: ज्यों-ज्यों जीप ऊँचाई चढ़ती है, बस्तियाँ-बाज़ार पीछे छूटते जाते हैं। नीचे घाटियों में पेड़-घर ताश के घरों-से छोटे दिखते हैं। हिमालय अपने विराट और भव्य रूप में सामने आता है। तिस्ता नदी चाँदी की धार-सी कौंधती बहती है। सेवेन सिस्टर्स वाटर फॉल ऊँचाई से वेग के साथ गिरता है — इस झरने में पाँव डुबोकर लेखिका को जीवन की अनंतता का अहसास होता है, मन काव्यमय हो उठता है।
श्रम-सौंदर्य: इसी स्वर्गीय सौंदर्य के बीच लेखिका पत्थर तोड़ती पहाड़ी स्त्रियों को देखती हैं — पीठ पर बँधे बच्चे और हाथों में कुदाल-हथौड़े। यहाँ भूख, मृत्यु और जीवित रहने का संघर्ष साथ-साथ है — मातृत्व और श्रम-साधना एक साथ। बी.आर.ओ. (बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइज़ेशन) के कर्मचारी बताते हैं कि पहाड़ों पर रास्ता बनाना अत्यंत खतरनाक कार्य है — डायनामाइट से चट्टानें उड़ाई जाती हैं; पिछले महीने एक मज़दूर की जान भी गई थी।
लायुंग और कटाओ: यूमथांग पहुँचने से पूर्व यात्री लायुंग नामक नन्ही-सी शांत बस्ती में रात बिताते हैं। तिस्ता के तट पर बना लकड़ी का घर, झरने का संगीत और मंदिर की घंटियाँ — अद्भुत शांति का वातावरण। रात में जितेन व साथी गाते-नाचते हैं; पचास वर्षीय सहेली मणि भी जोशीला नृत्य करती है। अगले दिन यात्री कटाओ की ओर बढ़ते हैं, जहाँ ताज़ा बर्फ़ देखकर सब रोमांचित हो उठते हैं।
3. प्रकृति-सौंदर्य व पर्यावरण-चेतना
पूरा पाठ प्रकृति के अलौकिक सौंदर्य के चित्रों से भरा है — गिरते झरने, फेन उगलते जल-प्रपात, चाँदी-सी कौंधती तिस्ता नदी, बर्फ़ से ढके पर्वत, घाटियों में बिखरे रंग-बिरंगे फूल और प्रियुता-रूडोडेंड्रो के फूल। लेखिका के लिए यह सौंदर्य ‘चलायमान सौंदर्य’ है — जीवन का असली आनंद इसी गतिशील, परिवर्तनशील सौंदर्य में है।
लायुंग से 500 फ़ीट ऊँचाई पर बसा कटाओ अभी टूरिस्ट स्पॉट न बनने के कारण अपने प्राकृतिक स्वरूप में सुरक्षित है। यहाँ ताज़ा, साबुन-के-झाग-सी बर्फ़ है। एक सिक्किमी नवयुवक बताता है कि प्रदूषण के चलते स्नो-फॉल लगातार कम हो रहा है। मणि कहती है — “ये हिमशिखर जल के स्तंभ हैं, पूरे एशिया के” — सर्दियों में बर्फ़ रूप में जल-संचय करते हैं और गर्मियों में पिघलकर सूखे कंठों को तृप्त करते हैं। प्रकृति की यह जल-संचय व्यवस्था अद्भुत है।
लेखिका का पर्यावरण-संदेश स्पष्ट है: हमारी पीढ़ी ने प्रकृति की लय-ताल-गति से खिलवाड़ कर अक्षम्य अपराध किया है। पहाड़ों के लोग प्रकृति की पूजा करते हैं, उसे गंदा नहीं करते — इसी से उनका पर्यावरण सुरक्षित है। मनुष्य को इस संतुलन का सम्मान करना चाहिए।
4. आस्था व श्रम का महत्त्व
आस्था: लेखिका दिखाती हैं कि मैदान हो या पहाड़ — इस देश की आत्मा एक-सी है। धर्म-चक्र, बौद्ध पताकाएँ, मंदिर की घंटियाँ, गुरुनानक के पदचिह्नों वाला पत्थर, खेदुम (देवी-देवताओं का निवास) — सब लोगों की आस्था और विश्वास के प्रतीक हैं। लेखिका के अनुसार आस्था ही पहाड़ी जीवन को कठोरता में भी टिकाए रखती है, और प्रकृति के प्रति श्रद्धा ही पर्यावरण की रक्षक है।
श्रम का महत्त्व: लेखिका श्रम के सौंदर्य को बार-बार उभारती हैं — पत्थर तोड़ती स्त्रियाँ, सड़क बनाते मज़दूर, कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते और शाम को मवेशी चराते-लकड़ी ढोते बच्चे, चाय की पत्तियाँ तोड़ती युवतियाँ। “कितना कम लेकर ये समाज को कितना अधिक वापस लौटा देती हैं” — यह कथन श्रम-शक्ति के प्रति लेखिका की गहरी श्रद्धा दर्शाता है। मेहनतकश लोग ही जीवन का सच्चा संतुलन बनाए रखते हैं।
5. भाषा-शैली
- विधा: यह यात्रा-वृत्तांत है — प्रथम पुरुष में आत्मकथात्मक एवं वर्णनात्मक शैली।
- चित्रात्मकता: दृश्यों के ऐसे सजीव चित्र कि पाठक स्वयं को वहाँ उपस्थित महसूस करता है — ‘ताश के घरों-से पेड़’, ‘चाँदी-सी कौंधती तिस्ता’।
- भाषा: सरल, भावमयी एवं प्रवाहपूर्ण हिंदी; बीच-बीच में नेपाली (साना-साना हाथ जोड़ि, राम रोछो, तिम्रो माया) तथा अंग्रेज़ी (थिंक ग्रीन, वेस्ट एट रिपेअरिंग) शब्दों का सहज प्रयोग।
- अलंकार: उपमा एवं मानवीकरण की भरमार — ‘सितारों की झालर’, ‘मुसकराते फूल’, ‘पाताल नापती घाटियाँ’।
- स्वर: सौंदर्यबोध के साथ-साथ चिंतनशील एवं संवेदनशील — सौंदर्य के पीछे का संघर्ष और पर्यावरण की चिंता।
6. कठिन शब्दार्थ
- अतींद्रियता — इंद्रियों से परे की अवस्था।
- उजास — प्रकाश, उजाला।
- रकम-रकम के — तरह-तरह के।
- रप्ता-रप्ता — धीरे-धीरे।
- शिद्दत — तीव्रता, प्रबलता, अधिकता।
- मशगूल — लीन, तल्लीन, व्यस्त।
- अभिशप्त — शापित, अभियुक्त।
- सरहद — सीमा।
- तामसिकता — तमोगुण से युक्त, कुटिल वृत्ति।
- वजूद — अस्तित्व।
- सयानी — समझदार, चतुर।
- जन्नत — स्वर्ग।
- चैरावेति-चैरावेति — चलते रहो, चलते रहो।
- ठाठे — हाथ में पड़ने वाली गाँठें या निशान।
- वेस्ट एट रिपेअरिंग — कम लेना और ज़्यादा देना।
- संक्रमण — मिलन, संयोग।
- सी लेवल — समुद्र तल।
- सुर्खियों में आना — चर्चा में आना।
- गुडुप कर लेना — निगल लेना।
7. मुख्य भाव
इस यात्रा-वृत्तांत का मुख्य भाव है — प्रकृति का अलौकिक सौंदर्य और उसके प्रति मनुष्य का उत्तरदायित्व। लेखिका बताती हैं कि सच्चा आनंद बाहरी भोग-विलास में नहीं, बल्कि प्रकृति के चलायमान सौंदर्य से एकात्म हो जाने में है। हिमालय की यात्रा लेखिका के लिए केवल पर्यटन नहीं, एक खोज-यात्रा और आध्यात्मिक अनुभव बन जाती है।
साथ ही पाठ तीन गहरे संदेश देता है — (1) श्रम का सम्मान: मेहनतकश लोग ही समाज को सबसे अधिक लौटाते हैं; (2) पर्यावरण की रक्षा: प्रदूषण से हिमशिखर पिघल रहे हैं, हमें प्रकृति की लय बिगाड़ने का अधिकार नहीं; (3) सीमा-प्रहरी सैनिकों के प्रति कृतज्ञता: कड़कड़ाती ठंड में हमारी नींद की रक्षा के लिए वे तैनात रहते हैं। शीर्षक की प्रार्थना — पूरा जीवन अच्छाइयों को समर्पित हो — इन्हीं भावों का सार है।
8. ध्यान देने योग्य बातें
- विधा अवश्य लिखें — यह यात्रा-वृत्तांत है, कहानी नहीं।
- स्थानों का क्रम याद रखें: गंगटोक → यूमथांग (149 किमी) → लायुंग → कटाओ।
- पात्र: लेखिका, गाइड जितेन नार्गे, सहेली मणि, एक नेपाली युवती (जिससे प्रार्थना सीखी)।
- तथ्य: कंचनजंघा = तीसरी सबसे ऊँची चोटी; 108 श्वेत पताकाएँ मृत्यु पर; कटाओ = भारत का स्विट्ज़रलैंड।
- शीर्षक का अर्थ और उसका भाव-संदेश से संबंध स्पष्ट करना सीखें।
9. त्वरित पुनरावृत्ति
- लेखिका: मधु कांकरिया — यात्रा-वृत्तांत, सिक्किम।
- शीर्षक-अर्थ: छोटे-छोटे हाथ जोड़कर प्रार्थना (नेपाली)।
- मुख्य स्थल: गंगटोक, यूमथांग, लायुंग, कटाओ; नदी — तिस्ता; झरना — सेवेन सिस्टर्स वाटर फॉल।
- मूल भाव: प्रकृति-सौंदर्य + पर्यावरण-चेतना + श्रम का सम्मान + आस्था + सैनिकों के प्रति कृतज्ञता।
- संदेश: थिंक ग्रीन — प्रकृति की लय बनाए रखें, जल-स्तंभ हिमशिखरों की रक्षा करें।
10. NCERT प्रश्न-अभ्यास के उत्तर
प्र.1 झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेखिका को किस तरह सम्मोहित कर रहा था?
रात में लेखिका को आसमान उलटा पड़ा-सा लगा — ढलान पर बिखरे तारे रोशनी की झालर-सी बना रहे थे। जगमगाता गंतोक रहस्यमयी रात में लेखिका के मन में ऐसा सम्मोहन जगा रहा था कि उसका सब कुछ स्थगित हो गया — उसकी चेतना और आस-पास सब शून्य हो गया, केवल डूबी रोशनी का जादुई झालर शेष रहा। उसी शून्य से एक प्रार्थना फूटने लगी।
प्र.2 गंतोक को ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ क्यों कहा गया?
गंतोक के लोगों ने अपने कठोर परिश्रम और लगन से इस पहाड़ी नगर को इतना सुंदर बनाया कि यहाँ सुबह, शाम, रात — सब कुछ मनोहारी है। परिश्रम से इस सौंदर्य के स्वामी बनने के कारण इन मेहनती लोगों को बादशाह और शहर को ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ कहा गया।
प्र.3 कभी श्वेत तो कभी रंगीन पताकाओं का फहराना किन अलग-अलग अवसरों की ओर संकेत करता है?
जब किसी बौद्ध की मृत्यु होती है, तब उसकी आत्मा की शांति के लिए किसी पवित्र स्थान पर 108 श्वेत पताकाएँ फहराई जाती हैं, जिन्हें उतारा नहीं जाता — वे स्वयं नष्ट होती हैं। किसी नए कार्य के शुभारंभ पर रंगीन पताकाएँ लगाई जाती हैं। अर्थात् श्वेत मृत्यु/शोक और रंगीन शुभारंभ/मंगल का प्रतीक है।
प्र.4 जितेन नार्गे ने लेखिका को सिक्किम की प्रकृति, भौगोलिक स्थिति एवं जनजीवन के बारे में क्या महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ दीं?
जितेन ने बताया — यूमथांग गंतोक से 149 किमी दूर है; बौद्ध पताकाओं का महत्त्व; धर्म-चक्र घुमाने से पाप धुलने की मान्यता; कवी-लोंग स्टॉक में ‘गाइड’ फ़िल्म की शूटिंग और संधि-पत्र की कथा; पहाड़ी जीवन की कठोरता — बच्चे रोज़ कई किमी पैदल स्कूल जाते व श्रम करते हैं; गुरुनानक के पदचिह्नों वाला पत्थर तथा खेदुम (देवी-देवताओं का निवास); प्रदूषण से घटती बर्फ़ आदि।
प्र.5 लोंग स्टॉक में घूमते हुए चक्र को देखकर लेखिका को पूरे भारत की आत्मा एक-सी क्यों दिखाई दी?
धर्म-चक्र घुमाने से पाप धुलने की मान्यता देखकर लेखिका को लगा कि चाहे मैदान हो या पहाड़, लोगों की आस्थाएँ, विश्वास, अंधविश्वास तथा पाप-पुण्य की धारणाएँ सर्वत्र एक-सी हैं। इसी समानता के कारण उन्हें पूरे भारत की आत्मा एक-सी दिखाई दी।
प्र.6 जितेन नार्गे की गाइड की भूमिका के बारे में विचार करते हुए लिखिए कि एक कुशल गाइड में क्या गुण होते हैं?
कुशल गाइड में होने चाहिए — क्षेत्र की पूरी भौगोलिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक जानकारी; हँसमुख, मिलनसार व विनोदी स्वभाव; पर्यटकों का उत्साह बनाए रखने की कला; जोखिम भरे रास्तों पर कुशल चालन; स्थानीय भाषा-रीति का ज्ञान तथा अपने देश/प्रकृति के प्रति गर्व व प्रेम। जितेन में ये सभी गुण थे।
प्र.7 इस यात्रा-वृत्तांत में लेखिका ने हिमालय के जिन-जिन रूपों का चित्र खींचा है, उन्हें अपने शब्दों में लिखिए।
हिमालय कभी छोटी पहाड़ियों के रूप में, तो कभी विराट, विशालकाय एवं भव्य रूप में सामने आता है। ऊँचे शिखरों से दूध-सी धार में गिरते जल-प्रपात, चाँदी-सी कौंधती तिस्ता नदी, फेन उगलते झरने, बर्फ़ से ढके हिम-शिखर, रंग-बिरंगे फूलों से लदी घाटियाँ — हिमालय का यह ‘पल-पल परिवर्तित’ रूप लेखिका के लिए कविता और दर्शन बन जाता है।
प्र.8 प्रकृति के उस अनंत और विराट स्वरूप को देखकर लेखिका को कैसी अनुभूति होती है?
झरने में पाँव डुबोकर लेखिका को लगा मानो वह स्वयं देश और काल की सीमाओं से दूर बहती धारा बन गई है। भीतर की सारी तामसिकता और दुष्ट वासनाएँ बह गईं, मन काव्यमय हो उठा। उसे जीवन की शक्ति और अनंतता का अहसास हुआ; ऐसा प्रतीत हुआ कि वह ईश्वर के निकट है — जीवन का आनंद यही चलायमान सौंदर्य है।
प्र.9 प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिक आनंद में डूबी लेखिका को कौन-कौन से दृश्य झकझोर गए?
सबसे पहले पत्थर तोड़ती पहाड़ी स्त्रियाँ — पीठ पर बच्चे बाँधे, हाथों में कुदाल-हथौड़े; भूख और जीवित रहने का संघर्ष। फिर स्कूल से लौटते छोटे बच्चे जो रोज़ कई किमी चढ़ाई चढ़ते व श्रम करते हैं; तथा सड़क बनाते मज़दूर जिनकी जान जोखिम में रहती है। इन दृश्यों ने उसे झकझोर दिया।
प्र.10 सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव करवाने में किन-किन लोगों का योगदान होता है, उल्लेख करें।
इसमें योगदान होता है — गाइड व ड्राइवर (जैसे जितेन) जो जानकारी व सुरक्षित यात्रा देते हैं; जान जोखिम में डालकर पहाड़ों पर रास्ता बनाने वाले बी.आर.ओ. के मज़दूर व इंजीनियर; सीमा पर तैनात सैनिक; तथा वे स्थानीय श्रमिक लोग जो अपने परिश्रम से इन क्षेत्रों को बसाते व सुंदर बनाते हैं।
प्र.11 “कितना कम लेकर ये समाज को कितना अधिक वापस लौटा देती हैं” — इस कथन के आधार पर स्पष्ट करें कि आम जनता की देश की आर्थिक प्रगति में क्या भूमिका है?
देश की आम मेहनतकश जनता (पत्थर तोड़ती स्त्रियाँ, मज़दूर, किसान) बहुत कम पाकर भी कठोर श्रम से समाज को बहुत अधिक देती है। यही श्रम-शक्ति सड़कें, खेती, उत्पादन और सेवाएँ चलाती है। इस प्रकार आम जनता ही देश की आर्थिक प्रगति की वास्तविक नींव है — वह ‘वेस्ट एट रिपेअरिंग’ अर्थात् कम लेकर अधिक लौटाने वाली शक्ति है।
प्र.12 आज की पीढ़ी द्वारा प्रकृति के साथ किस तरह का खिलवाड़ किया जा रहा है? इसे रोकने में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए?
आज की पीढ़ी वनों की कटाई, प्रदूषण, पहाड़ों की अंधाधुंध तोड़-फोड़ और प्रकृति की लय-ताल से छेड़छाड़ कर रही है, जिससे हिमशिखरों की बर्फ़ पिघल रही है। हमारी भूमिका — वृक्षारोपण, जल व ऊर्जा की बचत, प्रदूषण रोकना, ‘थिंक ग्रीन’ अपनाना और दूसरों को जागरूक करना होनी चाहिए।
प्र.13 प्रदूषण के कारण स्नोफॉल में कमी का ज़िक्र किया गया है? प्रदूषण के और कौन-कौन से दुष्परिणाम सामने आए हैं, लिखें।
प्रदूषण के अन्य दुष्परिणाम — वैश्विक तापवृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग), ग्लेशियरों का पिघलना व जल-संकट, ऋतु-चक्र में असंतुलन, अम्लीय वर्षा, साँस व त्वचा के रोग, जल-वायु-मृदा का दूषित होना, जीव-जंतुओं व पौधों की प्रजातियों का विलुप्त होना तथा पारिस्थितिक संतुलन का बिगड़ना।
प्र.14 ‘कटाओ’ पर किसी भी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है — इस कथन के पक्ष में अपनी राय व्यक्त कीजिए?
कटाओ में दुकान न होने से वहाँ भीड़, गंदगी, कूड़ा-कचरा और व्यावसायिक शोर-शराबा नहीं है। इसी कारण वह अपने मूल प्राकृतिक स्वरूप में स्वच्छ व सुंदर बना हुआ है — भारत का स्विट्ज़रलैंड। यदि वहाँ दुकानें खुलतीं तो प्रदूषण व पर्यटकों की भीड़ उसकी प्राकृतिक सुंदरता नष्ट कर देती। इसलिए दुकान का न होना सचमुच वरदान है।
प्र.15 प्रकृति ने जल संचय की व्यवस्था किस प्रकार की है?
सर्दियों में प्रकृति वर्षा के जल को बर्फ़ के रूप में हिमशिखरों पर संचित कर लेती है। गर्मियों में जब जल की भारी आवश्यकता होती है, तब यही बर्फ़ पिघलकर जलधारा बनकर नदियों के रूप में बहती है और सूखे कंठों को तृप्त करती है। हिमशिखर पूरे एशिया के ‘जल-स्तंभ’ हैं — यह प्रकृति की अद्भुत जल-संचय व्यवस्था है।
प्र.16 देश की सीमा पर बैठे फ़ौजी किस तरह की कठिनाइयों से जूझते हैं? उनके प्रति हमारा क्या उत्तरदायित्व होना चाहिए?
सीमा पर तैनात सैनिक माइनस तापमान की कड़कड़ाती ठंड, बर्फ़ीले तूफ़ान, ऑक्सीजन की कमी, खतरनाक रास्तों और परिवार से दूरी जैसी अनेक कठिनाइयाँ झेलते हैं ताकि हम चैन की नींद सो सकें। हमारा उत्तरदायित्व है कि हम उनके प्रति कृतज्ञ रहें, उनका सम्मान करें, देश की एकता-अखंडता बनाए रखें और राष्ट्र-हित में अपना कर्तव्य निभाएँ।
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