- कविता: "मेघ आए" — सर्वेश्वरदयाल सक्सेना द्वारा रचित प्रकृति-केंद्रित गीत।
- संग्रह: काठ की घंटियाँ | विधा: गीत (लोकगीत-शैली)
- केंद्रीय भाव: बरसात के मेघों के आगमन को दामाद के गाँव आने की घटना के रूप में चित्रित किया गया है।
- मुख्य अलंकार: मानवीकरण — मेघ, पेड़, नदी, पीपल, बिजली सभी मानव-पात्र बन जाते हैं।
- महत्व: भारतीय ग्रामीण जीवन और लोक-संस्कृति का सुंदर काव्यात्मक चित्र।
- परीक्षा-भार: ~5 अंक — भावार्थ/व्याख्या (2-3 अंक), अलंकार (1-2 अंक), लघु-उत्तर।
1. कवि परिचय — सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
जन्म: 15 सितंबर 1927, बस्ती (उत्तर प्रदेश) | निधन: 23 सितंबर 1983
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना हिन्दी के नई कविता आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने कविता को आम जन-जीवन से जोड़ा और ग्रामीण परिवेश, प्रकृति तथा सामाजिक सरोकारों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। वे प्रतिष्ठित पत्रिका दिनमान के संपादक भी रहे।
प्रमुख रचनाएँ:
- काव्य-संग्रह: काठ की घंटियाँ, बाँस का पुल, एक सूनी नाव, गर्म हवाएँ, कुआनो नदी, जंगल का दर्द, खूँटियों पर टँगे लोग।
- बाल-साहित्य: भौंरा, बतूता का जूता (बहुत लोकप्रिय), बकरी।
- नाटक: बकरी (प्रसिद्ध व्यंग्य नाटक)।
काव्य-विशेषताएँ:
- सरल एवं लोक-बोली के निकट भाषा।
- ग्रामीण जीवन के जीवंत बिंब और चित्र।
- प्रकृति का अत्यंत सफल मानवीकरण।
- गीत-शैली — लय, संगीत और पुनरावृत्ति (टेक) का प्रयोग।
- आम आदमी की पीड़ा और आनंद — दोनों का सजीव चित्रण।
साहित्यिक स्थान: सक्सेना जी की कविताएँ पाठक को एक ऐसे संसार में ले जाती हैं जहाँ प्रकृति और मानव अटूट रूप से जुड़े हैं। "मेघ आए" इसी भावभूमि की उत्कृष्ट कविता है जो पाठ्यपुस्तक क्षितिज-1 में संकलित है।
2. कविता का परिचय एवं केंद्रीय भाव
"मेघ आए" कविता में कवि ने वर्षा के मेघों के आगमन को अत्यंत मनोरम और जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है। कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कवि ने मेघ को दामाद की उपमा दी है — जो बहुत दिनों के बाद अपनी ससुराल (गाँव) आया है।
मुख्य रूपक चार्ट:
| प्रकृति-तत्व | मानवीय रूप | प्रतीकार्थ |
|---|---|---|
| मेघ (बादल) | दामाद / मेहमान | शहर से सजधज कर आया पाहुन |
| बयार (हवा) | बाराती / अग्रदूत | आगे-आगे नाच-गाकर खबर देने वाला |
| पेड़-पौधे | उत्सुक गाँव वाले | गरदन उचकाकर दामाद को देखते लोग |
| बूढ़ा पीपल | वृद्ध बुज़ुर्ग / सास | झुककर दामाद का अभिवादन करता है |
| आँधी / धूल | शर्माती-भागती युवतियाँ | घाघरा उठाकर दौड़ती लड़कियाँ |
| नदी | प्रिया / नवविवाहिता | बाँकी नज़र से देखकर ठिठकती है |
| बिजली (दामिनी) | चमकती-झलकती दुल्हन | अटारी से झाँकती नवोढ़ा |
| वर्षा / बारिश | मिलन के आँसू / तृप्ति | दीर्घ प्रतीक्षा के बाद मिलन का आनंद |
3. कविता का पाठ एवं प्रत्येक पद का भावार्थ
पद 1 — मेघ का आगमन (टेक / मुखड़ा)
आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली,
दरवाज़े-खिड़कियाँ खुलने लगीं गली-गली,
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
कठिन शब्द: बन-ठन = सजधज कर | सँवर के = सँवरकर, तैयार होकर | बयार = हवा, पवन | पाहुन = मेहमान, दामाद (अवधी/ब्रज शब्द)
भावार्थ: मेघ (बादल) बहुत सजधज कर, बन-ठनकर आए हैं — ठीक उसी तरह जैसे कोई शहरी दामाद गाँव में ससुराल आता है तो खूब तैयार होकर आता है। उनके आने से पहले बयार (हवा) नाचती-गाती आगे-आगे चलती है, जैसे बारात में आगे ढोल-नगाड़े बजाने वाले चलते हैं। हवा के आते ही गली-गली के दरवाज़े-खिड़कियाँ खुल जाती हैं — मानो सारा गाँव मेहमान को देखने के लिए बाहर आ जाता हो। टेक (मुखड़ा) — "मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के" — बार-बार दोहराकर कवि मेघ के आगमन के महत्व और उत्सव पर बल देता है। यह लोकगीत की शैली है।
पद 2 — पेड़ों का स्वागत, आँधी और नदी का ठिठकना
आँधी चली, धूल भागी घाघरा उठाए,
बाँकी चितवन उठा नदी ठिठकी, पूछा —
"बाँध दिए क्या पाँव? बाँध दिए हैं पाँव?"
नाचे गाए बयार, पीपल बूढ़ा झुका।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
कठिन शब्द: गरदन उचकाए = गर्दन ऊँची करके | घाघरा = लहँगा (यहाँ धूल की उड़ती लहर) | बाँकी चितवन = टेढ़ी, तिरछी, मनमोहक नज़र | ठिठकी = रुक गई | पीपल बूढ़ा = वृद्ध पीपल का पेड़ (घर के बुज़ुर्ग का प्रतीक)
भावार्थ: मेघ को आते देख पेड़ गरदन उचकाकर झाँकने लगते हैं — ठीक वैसे जैसे गाँव के उत्सुक लोग दामाद को देखने के लिए गर्दन उठाकर झाँकते हैं। आँधी आती है और धूल घाघरा उठाए भागती है — मानो शर्माती-दौड़ती युवतियाँ हों। नदी अपनी तिरछी (बाँकी) नज़र उठाकर मेघ को देखकर ठिठक जाती है और पूछती है — "क्या तुमने पाँव बाँध लिए हैं?" (यानी क्या अब तुम रुकोगे, ठहरोगे?)। यह विरह के बाद मिलन की अकुलाहट है। बूढ़ा पीपल झुककर मेघ का अभिवादन करता है — जैसे घर का बुज़ुर्ग दामाद को देखकर झुकता है।
पद 3 — बिजली की चमक और आकाश का उद्घोष
मेघ का संदेश देने आई थी बयार,
बोला अकास — "धरती से मेरी दूरी कम है।"
कजरारे बादल छाए,
बिजली चमकी, चमक गई।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
कठिन शब्द: अकास = आकाश (देसी रूप) | कजरारे = काजल जैसे काले | बयार = हवा, वायु
भावार्थ: बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर मेघ का स्वागत किया — जैसे घर का सबसे बड़ा बुज़ुर्ग आगे आकर दामाद का आदर करता है। हवा (बयार) पहले ही मेघ का संदेश लेकर आ गई थी — जैसे बारात से पहले कोई सूचना लेकर आता है। आकाश बोला — "धरती से मेरी दूरी अब कम हो गई है" — अर्थात् मेघ नीचे धरती के निकट उतर आए हैं। काजल-से काले बादल छा गए और बिजली चमकी — यह दामाद की चमकती आँखों का प्रतीक है। वातावरण में उत्सव और रोमांच का रंग भर गया।
पद 4 — क्षितिज-अटारी, दामिनी और वर्षा का मिलन
लाई हैं पलकों में मेघ की परछाईं।
नभ के नाते निभाता है हर साल यहाँ,
क्षितिज अटारी से लहरा कर
चली बिजली दामिनी।
बिन बादल बरसात आई।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
कठिन शब्द: क्षितिज = आकाश और धरती का मिलन-बिंदु | अटारी = ऊपरी मंज़िल, छज्जा | दामिनी = बिजली, विद्युत | नभ = आकाश | परछाईं = छाया, प्रतिबिम्ब | ग़ैरों के आशीषें = दूसरों (अतिथि) के आशीर्वाद
भावार्थ: क्षितिज की अटारी (जहाँ आकाश धरती से मिलता है) से बिजली (दामिनी) लहराकर चलती है — जैसे ससुराल की अटारी से नई बहू/युवती मेहमान का स्वागत करती है। पलकों में मेघ की परछाईं लिए नदी/धरती लंबे समय से उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। मेघ हर साल "नभ के नाते" निभाने आता है — यह वार्षिक मिलन की प्रतीक्षा और रिश्ते की गहराई है। अंत में "बिन बादल बरसात आई" — भावनाओं की वर्षा हो गई; आँसू और वर्षा की बूँदें मिल गईं — मिलन का आनंद, विरह का अंत।
4. मुख्य विषय-वस्तु (Themes)
4.1 वर्षा का उत्सव
कविता का प्रमुख विषय वर्षा ऋतु का उत्साहपूर्ण स्वागत है। भारतीय ग्रामीण जीवन में वर्षा सिर्फ मौसम नहीं, एक पर्व है। खेत, नदियाँ, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सभी वर्षा की प्रतीक्षा में रहते हैं। कवि ने इस सामूहिक उत्सव को शब्दों में ढाला है।
4.2 प्रकृति का मानवीकरण
कविता का दूसरा बड़ा विषय प्रकृति का मानवीकरण है। प्रत्येक प्राकृतिक तत्व मानव-पात्र बन जाता है और अपने स्वभाव के अनुसार व्यवहार करता है। यह कविता का केंद्रीय शिल्प-विधान भी है।
4.3 ग्रामीण जीवन और लोक-संस्कृति
दामाद के आगमन की परंपरा, ससुराल में स्वागत की रीत, बूढ़े बुज़ुर्गों का आशीर्वाद, युवतियों की लज्जा — ये सब भारतीय ग्रामीण संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। कवि ने इन्हें बड़ी कुशलता से प्रकृति में उतारा है।
4.4 विरह और मिलन
नदी का मेघ से पूछना — "बाँध दिए क्या पाँव?" — यह विरह और मिलन का मार्मिक भाव है। मेघ एक वर्ष की प्रतीक्षा के बाद आता है। यह वार्षिक मिलन प्रेम और प्रतीक्षा दोनों का प्रतीक है।
4.5 प्रकृति-मनुष्य का एकात्म संबंध
इस कविता में प्रकृति और मनुष्य के बीच कोई दूरी नहीं है — दोनों एक-दूसरे में घुले-मिले हैं। यह भारतीय काव्य-परंपरा की विशेषता है।
5. अलंकार (Literary Devices)
5.1 मानवीकरण / मानवीकरण अलंकार (Personification)
यह कविता का सर्वप्रमुख अलंकार है। जहाँ निर्जीव वस्तुओं या प्रकृति के तत्वों पर मानवीय क्रियाओं, भावों या व्यवहार का आरोपण किया जाए — वहाँ मानवीकरण होता है।
- "आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली" — हवा नाच-गाकर आगे चल रही है।
- "पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाए" — पेड़ गर्दन उठाकर झाँक रहे हैं।
- "पीपल बूढ़ा झुका" — पीपल का पेड़ बुज़ुर्ग की भाँति झुककर अभिवादन करता है।
- "बाँकी चितवन उठा नदी ठिठकी, पूछा" — नदी ने तिरछी नज़र से देखा और ठिठक कर पूछती है।
- "बोला अकास" — आकाश ने स्वयं बात की।
- "धूल भागी घाघरा उठाए" — धूल एक स्त्री की तरह घाघरा उठाकर भाग रही है।
5.2 रूपक (Metaphor)
जहाँ उपमेय पर उपमान का पूरी तरह आरोपण हो (बिना 'सा', 'जैसे' के) — वहाँ रूपक होता है।
- "क्षितिज अटारी" — क्षितिज को ही अटारी कह दिया गया है। (उपमेय = क्षितिज, उपमान = अटारी)
- पूरी कविता में मेघ = दामाद — यह विस्तारित रूपक है।
- बयार = अग्रदूत / बाराती — हवा को बारात की अगुआई करने वाला बना दिया गया है।
5.3 उत्प्रेक्षा (Fancy / Imagination)
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए — "ज्यों", "मानो", "जानो" आदि से।
- "पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के" — मेघ को शहरी मेहमान/दामाद की संभावना दी गई है।
- "धूल भागी घाघरा उठाए" — धूल के उड़ने को घाघरा उठाकर भागने की कल्पना से जोड़ा गया है।
5.4 अनुप्रास (Alliteration)
एक ही व्यंजन-ध्वनि की आवृत्ति से संगीत उत्पन्न होता है।
- "बन-ठन के सँवर के" — 'ब' की आवृत्ति।
- "बाँकी चितवन" — 'ब' की ध्वनि।
- "बिन बादल बरसात" — 'ब' की त्रिगुण आवृत्ति।
- "नाचती-गाती" — स्वर-लय की संगीतात्मकता।
5.5 पुनरुक्ति / टेक (Refrain)
"मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के" — यह पंक्ति कविता में बार-बार आती है। इससे कविता में लोकगीत जैसी लय, संगीत और जादुई प्रभाव उत्पन्न होता है।
6. काव्य-सौंदर्य
6.1 भाषा-सौंदर्य
कवि ने सरल, सहज हिन्दी का प्रयोग किया है जिसमें ग्रामीण बोलचाल के शब्द घुले-मिले हैं — "पाहुन", "घाघरा", "अटारी", "बाँकी चितवन", "अकास", "जुहार" जैसे देसी शब्द कविता को एक लोकगीत का प्राण देते हैं।
6.2 बिम्ब-योजना (Imagery)
- दृश्य बिम्ब: कजरारे बादल, बिजली की चमक, धूल का उड़ना — पूरा दृश्य आँखों के सामने उपस्थित।
- श्रव्य बिम्ब: नाचती-गाती बयार, आँधी का शोर — कानों में ध्वनि गूँजती है।
- गतिशील बिम्ब: पेड़ों का झाँकना, नदी का ठिठकना, बिजली का लहराना — सारे चित्र गतिशील हैं।
6.3 लोक-संस्कृति का सजीव चित्रण
दामाद के आगमन का उत्सव, ससुराल में स्वागत की परंपरा, बुज़ुर्गों का आशीर्वाद — इन सबका यथार्थ और भावपूर्ण चित्रण है। यह कविता एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी है।
6.4 गीत-शैली और संगीतात्मकता
टेक (refrain) — "मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के" — बार-बार लौटती है। इससे कविता में लोकगीत जैसी लय और संगीत उत्पन्न होता है जो पाठक को आनंदित करता है।
6.5 विनोद और मीठी शिकायत
"बाँध दिए क्या पाँव?" — नदी का यह प्रश्न मीठे व्यंग्य और प्रेम-भरी शिकायत का भाव लिए है। यह विनोदपूर्ण संवाद कविता को बहुत रोचक बना देता है।
7. शब्द-अर्थ (Word Meanings)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मेघ | बादल, वर्षा के बादल |
| बन-ठन | सज-सँवरकर, शृंगार करके |
| सँवर के | सँवरकर, तैयार होकर |
| बयार | हवा, वायु, पवन |
| पाहुन | मेहमान; विशेषतः दामाद (अवधी) |
| गरदन उचकाए | गर्दन ऊँची करके |
| घाघरा | लहँगा; यहाँ धूल की उड़ती लहर का प्रतीक |
| बाँकी चितवन | टेढ़ी, तिरछी, मनमोहक दृष्टि |
| ठिठकी | रुक गई, ठहर गई |
| अकास | आकाश (देसी रूप) |
| कजरारे | काजल जैसे काले, श्यामल |
| क्षितिज | जहाँ आकाश और धरती मिलते दिखते हैं |
| अटारी | मकान की ऊपरी मंज़िल, छज्जा |
| दामिनी | बिजली, विद्युत, चपला |
| नभ | आकाश, गगन |
| परछाईं | छाया, प्रतिबिम्ब |
| जुहार | अभिवादन, प्रणाम |
| पलकों में | आँखों में, हृदय में संजोकर |
8. NCERT प्रश्नोत्तर
उत्तर: बादलों के आने पर प्रकृति में निम्नलिखित गतिविधियाँ हुईं —
- हवा (बयार) नाचती-गाती हुई आगे-आगे चली।
- गली-गली में दरवाज़े-खिड़कियाँ खुलने लगीं।
- पेड़ गरदन उचकाकर झाँकने लगे।
- आँधी चली और धूल घाघरा उठाकर भागती दिखी।
- नदी ने बाँकी चितवन उठाकर मेघ को देखा और ठिठककर पूछा।
- बूढ़ा पीपल झुककर अभिवादन करने लगा।
- काजल जैसे काले बादल छा गए और बिजली चमकी।
- क्षितिज की अटारी से बिजली (दामिनी) लहराकर चली।
उत्तर: मेघ (बादल) नभ के नाते निभाता है। मेघ हर वर्ष वर्षा ऋतु में धरती पर आता है, जैसे एक दामाद ससुराल में हर साल आता है। वह धरती को जल देकर उसे तृप्त करता है और फिर लौट जाता है। यह वार्षिक मिलन ही उसका "नाता" है — आकाश (नभ) और धरती का शाश्वत संबंध।
उत्तर:
- "आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली" — हवा नाच-गा रही है।
- "पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाए" — पेड़ झाँक रहे हैं।
- "पीपल बूढ़ा झुका" — पीपल झुककर अभिवादन कर रहा है।
- "बाँकी चितवन उठा नदी ठिठकी, पूछा" — नदी प्रश्न पूछ रही है।
- "बोला अकास" — आकाश बोल रहा है।
- "धूल भागी घाघरा उठाए" — धूल स्त्री की भाँति घाघरा उठाकर भाग रही है।
उत्तर: कवि ने मेघों के आगमन को दामाद के ससुराल में आगमन से जोड़ा है। मेघ बन-ठन कर आते हैं जैसे शहरी दामाद गाँव में आता है। हवा बारातियों की तरह आगे-आगे नाचती-गाती है। पेड़-पौधे गाँव वालों की तरह झाँकते हैं। बूढ़ा पीपल बुज़ुर्ग की तरह जुहार करता है। नदी नई बहू/प्रिया की तरह शर्माकर ठिठकती है।
उत्तर: इस पंक्ति में मानवीकरण अलंकार है। धूल एक निर्जीव वस्तु है, किन्तु उसे एक स्त्री की भाँति घाघरा उठाकर भागते हुए दिखाया गया है। इससे आँधी के समय उड़ती धूल का बड़ा सजीव और रोचक चित्र उपस्थित हो जाता है। साथ ही यहाँ उत्प्रेक्षा का भी सुंदर प्रयोग है — धूल के उड़ने में घाघरा उठाने की कल्पना की गई है।
उत्तर: नदी यह प्रश्न मेघ (बादल) से पूछती है। वह इसलिए पूछती है कि मेघ बहुत दिनों (एक वर्ष) बाद आए हैं और वह जानना चाहती है कि क्या वे अब रुकेंगे। "पाँव बाँधना" का अर्थ है रुक जाना, स्थायी रूप से ठहरना। यह नदी की विरह-भावना और मिलन की तीव्र इच्छा का प्रतीक है — वह नहीं चाहती कि मेघ जल्दी चले जाएँ।
उत्तर:
- गाँव में दामाद का आगमन एक उत्सव की तरह मनाया जाता है।
- पड़ोस और परिवार मिलकर मेहमान का स्वागत करते हैं।
- बुज़ुर्गों का आदर और आशीर्वाद देने की परंपरा है।
- प्रकृति और मानव-जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।
- ग्रामीण महिलाएँ लाज-शरम रखती हैं (नदी का ठिठकना, धूल का घाघरा उठाना)।
- शहर और गाँव के बीच एक विशिष्ट संबंध — शहरी दामाद गाँव में विशेष आदर पाता है।
उत्तर: कविता में "मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के" पंक्ति बार-बार टेक के रूप में आती है। इसका महत्व यह है — (1) यह कविता को लोकगीत की शैली में ढालती है, (2) मेघ के आगमन का उत्साह और महत्व बार-बार ताज़ा होता है, (3) कविता में संगीत और लय उत्पन्न होती है, (4) पाठक के मन में मुख्य भाव की पुनरावृत्ति होती है।
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
- नागार्जुन
- कबीरदास
- एक राजा से
- गाँव के बुज़ुर्ग से
- शहर से आए दामाद (पाहुन) से
- एक विद्यार्थी से
- वर्षा के रुकने का प्रतीक
- मेघ के आगे-आगे नाचती-गाती हवा — बारात के अगुआ की तरह
- बादलों के काले रंग का प्रतीक
- बिजली का दूसरा नाम
- उपमा
- अनुप्रास
- मानवीकरण
- श्लेष
- उपमा
- रूपक
- उत्प्रेक्षा
- अतिशयोक्ति
- तेज़ी से बह जाती है
- तिरछी नज़र से देखकर रुक जाती है
- सूख जाती है
- उफनकर बाढ़ आ जाती है
- मध्य प्रदेश
- राजस्थान
- उत्तर प्रदेश
- बिहार
- बाँस का पुल
- काठ की घंटियाँ
- एक सूनी नाव
- जंगल का दर्द
- नदी की लहरों का
- आँधी के समय उड़ती धूल की लहर का (स्त्री का घाघरा उठाने की कल्पना)
- खेतों की फसल का
- वर्षा के रुकने का
- यात्री
- व्यापारी
- मेहमान / दामाद
- किसान
- रूपक और उपमा
- मानवीकरण और अनुप्रास
- श्लेष और यमक
- उत्प्रेक्षा और रूपक
- बिना बादल के वर्षा हो गई — प्रकृति का चमत्कार
- भावनाओं की वर्षा हो गई — मिलन और प्रेम का अतिरेक
- बादल चले गए और सूखा पड़ गया
- नदी उफनकर बह गई
(i) मानवीकरण: "पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाए" — पेड़ों पर मानवीय क्रिया (झाँकना, गरदन उठाना) का आरोपण किया गया है। पेड़ मनुष्यों की तरह उत्सुकता से व्यवहार कर रहे हैं।
(ii) रूपक: "क्षितिज अटारी" — यहाँ क्षितिज (उपमेय) को सीधे अटारी (उपमान) कह दिया गया है, बिना 'जैसे' या 'सा' के — यह रूपक अलंकार का स्पष्ट उदाहरण है।
(i) सरल और लोक-बोली के निकट भाषा: कवि ने "पाहुन", "घाघरा", "अटारी", "बाँकी चितवन", "अकास", "जुहार" जैसे देसी और ग्रामीण शब्दों का प्रयोग किया है जो आम जन को तुरंत समझ आते हैं और कविता को लोकगीत जैसा बनाते हैं।
(ii) गीत-शैली और संगीतात्मकता: "मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के" — टेक (refrain) की बार-बार आवृत्ति से कविता में लोकगीत जैसी लय और संगीत उत्पन्न होता है, जो पाठक को कविता से बाँधे रखता है।
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