- यह एक व्यंग्यात्मक निबंध है जिसे हिंदी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा है।
- निबंध में लेखक प्रेमचंद की एक पुरानी तस्वीर देखते हैं जिसमें उनके जूते फटे हुए हैं।
- फटे जूते प्रतीक हैं — प्रेमचंद की बेपरवाही, आर्थिक तंगी, और सामाजिक समझौता न करने की ईमानदारी के।
- परसाई जी काल्पनिक संवाद के जरिए प्रेमचंद से पूछते हैं कि जूते नए क्यों नहीं पहने — इसी बहाने वे समाज पर करारा व्यंग्य करते हैं।
- परीक्षा भार: ~5 अंक — सारांश/भाव-बोध प्रश्न (2-3 अंक) और लेखक-परिचय/व्यंग्य प्रश्न (2 अंक)।
1. लेखक परिचय — हरिशंकर परसाई
जन्म: 22 अगस्त 1924, होशंगाबाद (मध्यप्रदेश) | निधन: 10 अगस्त 1995, जबलपुर।
हरिशंकर परसाई हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकारों में से एक हैं। उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया और कुछ समय अध्यापन किया, किंतु बाद में पूर्णतः लेखन को समर्पित हो गए। उनकी रचनाएँ समाज की कुरीतियों, राजनीतिक भ्रष्टाचार और मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं पर करारी चोट करती हैं।
प्रमुख रचनाएँ:
- निबंध संग्रह: तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, वैष्णव की फिसलन, पगडंडियों का जमाना।
- कहानी संग्रह: हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे।
- उपन्यास: रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज।
- संस्मरण: तिरछी रेखाएँ।
परसाई जी की भाषा सरल, बोलचाल की हिंदी है जिसमें व्यंग्य बहुत तीखा और सटीक होता है। वे किसी भी विषय को साधारण घटना या वस्तु के बहाने उठाते हैं और उसे गहरे सामाजिक सरोकार से जोड़ देते हैं। उन्हें 1982 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया।
लेखन की विशेषताएँ: परसाई जी व्यंग्य को केवल हँसाने का साधन नहीं मानते, बल्कि वे इसे सामाजिक बदलाव का हथियार मानते हैं। उनका व्यंग्य आत्मा को झकझोरता है और पाठक को सोचने पर मजबूर करता है।
2. पाठ का सारांश — प्रेमचंद के फटे जूते
इस व्यंग्य निबंध का आरंभ तब होता है जब लेखक हरिशंकर परसाई अपने प्रिय साहित्यकार प्रेमचंद की एक पुरानी तस्वीर देखते हैं। उस तस्वीर में प्रेमचंद अपनी पत्नी शिवरानी देवी के साथ बैठे हैं। लेखक ध्यान से देखते हैं तो पाते हैं कि प्रेमचंद के जूते का अगला भाग फटा हुआ है और उसमें से अँगुली बाहर निकली हुई है।
यह देखकर लेखक के मन में अनेक प्रश्न उठते हैं। वे आश्चर्य करते हैं कि जब तस्वीर खिंचवाने जैसा महत्त्वपूर्ण अवसर था, तब प्रेमचंद ने नए जूते क्यों नहीं पहने? यहीं से लेखक प्रेमचंद से एक काल्पनिक संवाद आरंभ करते हैं।
परसाई जी कल्पना करते हैं कि प्रेमचंद कह रहे हों — "मेरे पास नए जूते नहीं थे।" लेखक तब सोचते हैं कि शायद उनके पास पैसे नहीं थे, या उन्होंने जानबूझकर नए जूते नहीं खरीदे। इसी क्रम में लेखक यह भी सोचते हैं कि प्रेमचंद ने शायद कभी किसी से माँगकर जूते लेने की कोशिश नहीं की। उन्होंने कभी समझौता नहीं किया।
परसाई जी आगे व्यंग्य करते हैं — "मैं जब भी कहीं जाता हूँ, पहले देखता हूँ कि मेरे कपड़े-जूते ठीक हैं या नहीं। लेकिन प्रेमचंद तो सीधे चले जाते थे — बिना दिखावे के।" इससे वे यह स्पष्ट करते हैं कि आत्मसम्मान और सादगी प्रेमचंद की पहचान थी।
लेखक परसाई फिर व्यंग्य को और तेज करते हैं। वे कहते हैं कि उस जमाने में और आज भी लोग "इज्जत" के लिए जूते उधार माँग लेते हैं, खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश करते हैं। लेकिन प्रेमचंद ऐसे नहीं थे। उन्होंने फटे जूतों में भी तस्वीर खिंचवाई — यह उनकी बेपरवाही नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और ईमानदारी थी।
लेखक आगे सोचते हैं — "जूते इसलिए फटते हैं क्योंकि आदमी चलता है, संघर्ष करता है।" प्रेमचंद ने जीवन भर संघर्ष किया — आर्थिक तंगी, सामाजिक दबाव और साहित्यिक उपेक्षा के बावजूद वे लिखते रहे। उनके फटे जूते उनके इसी जीवट और संघर्ष के प्रतीक हैं।
निबंध के अंत में परसाई जी यह व्यंग्य करते हैं कि आज के समाज में लोग बाहरी दिखावे, नाम और पद के लिए समझौता करते हैं, झूठी इज्जत की परवाह करते हैं। प्रेमचंद इससे ऊपर थे। उनके फटे जूते वास्तव में उनकी महानता, सादगी और समझौताहीन व्यक्तित्व के प्रतीक हैं।
3. प्रेमचंद का व्यक्तित्व
प्रेमचंद (1880-1936) हिंदी और उर्दू के महान कथाकार हैं। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। वे 'उपन्यास सम्राट' कहे जाते हैं।
इस निबंध में प्रेमचंद के व्यक्तित्व की जो छवि उभरती है वह इस प्रकार है:
- सादगी और सरलता: प्रेमचंद ने कभी बाहरी दिखावे की परवाह नहीं की। तस्वीर में फटे जूते पहनना यही बताता है।
- आत्मसम्मान: उन्होंने कभी किसी से उधार जूते माँगकर खुद को बड़ा नहीं दिखाया। जो थे, उसी में संतुष्ट रहे।
- संघर्षशीलता: आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपना लेखन जारी रखा। जूते का फटना उनके लंबे संघर्ष का प्रतीक है।
- समझौताहीन व्यक्तित्व: प्रेमचंद ने कभी सामाजिक दबाव या लालच के सामने झुककर अपनी कलम को नहीं बेचा।
- ईमानदारी: वे जैसे थे वैसे ही सामने आए — बिना किसी मुखौटे के।
- बेपरवाही (सकारात्मक अर्थ में): उन्हें इस बात की चिंता नहीं थी कि लोग क्या सोचेंगे। वे आत्मकेंद्रित और आत्मविश्वासी थे।
परसाई जी प्रेमचंद की इस छवि के जरिए अपने समकालीन समाज पर तंज कसते हैं जहाँ लोग केवल बाहरी आडंबर और दिखावे में डूबे हैं।
4. व्यंग्य और विडंबना
यह निबंध व्यंग्य की एक उत्कृष्ट रचना है। परसाई जी ने इसमें कई स्तरों पर व्यंग्य किया है:
(क) प्रत्यक्ष व्यंग्य — आधुनिक समाज पर:
आज का समाज बाहरी दिखावे को बहुत महत्त्व देता है। लोग जूते उधार माँगकर, कपड़े किराए पर लेकर तस्वीर खिंचवाते हैं — केवल इसलिए कि समाज में "अच्छे" दिखें। परसाई जी व्यंग्य करते हैं कि यह झूठी इज्जत है। प्रेमचंद ने ऐसा नहीं किया — यह उनकी वास्तविक महानता है।
(ख) विडंबना — महान लेखक की दरिद्रता:
प्रेमचंद जैसे महान साहित्यकार — जिन्होंने हजारों पन्ने लिखे, लाखों पाठकों को प्रभावित किया — उनके पास ढंग के जूते तक नहीं थे। यह समाज की उस विडंबना को उजागर करता है जिसमें कलाकार और साहित्यकार सबसे उपेक्षित होते हैं।
(ग) आत्म-व्यंग्य:
परसाई जी खुद को भी इस व्यंग्य से नहीं बचाते। वे कहते हैं कि वे स्वयं भी दिखावे की परवाह करते हैं — जूते देखते हैं, कपड़े देखते हैं। इस तरह वे ईमानदारी से अपनी कमजोरी भी स्वीकार करते हैं और इसी से व्यंग्य और तीखा हो जाता है।
(घ) व्यंग्य का शिल्प:
- काल्पनिक संवाद के जरिए मृत व्यक्ति से बात करना एक अनोखा शिल्प है।
- छोटी-सी तस्वीर से बड़े सामाजिक सवाल उठाना परसाई जी की विशेषता है।
- सरल भाषा में तीखा कटाक्ष — पाठक हँसते-हँसते सोचने पर मजबूर हो जाता है।
5. प्रतीकात्मकता — फटे जूते का अर्थ
इस निबंध में फटे जूते केवल एक वस्तु नहीं हैं — वे एक शक्तिशाली प्रतीक हैं। आइए देखें, यह प्रतीक किन-किन अर्थों को वहन करता है:
- संघर्ष का प्रतीक: जूते इसलिए फटते हैं क्योंकि आदमी चलता है। जितना अधिक संघर्ष, उतना अधिक घिसाव। प्रेमचंद का पूरा जीवन संघर्षमय था — यह संघर्ष उनके जूतों में दिखता है।
- ईमानदारी का प्रतीक: फटे जूते पहनकर तस्वीर खिंचवाना यह बताता है कि प्रेमचंद ने कभी खुद को वह नहीं दिखाया जो वे नहीं थे। वे हमेशा सच्चे रहे।
- आर्थिक विपन्नता का प्रतीक: यह उस दौर के साहित्यकारों की आर्थिक दुर्दशा को दर्शाता है।
- बेपरवाही का प्रतीक (सकारात्मक): प्रेमचंद को बाहरी चमक-दमक की परवाह नहीं थी — वे आत्मकेंद्रित थे।
- सामाजिक समझौता न करने का प्रतीक: नए जूते के लिए किसी के सामने हाथ न फैलाना — यह उनके स्वाभिमान का प्रतीक है।
- आडंबरहीनता का प्रतीक: झूठी इज्जत के लिए उधार के जूते नहीं पहने — यह उनकी वास्तविक महानता है।
इस तरह एक छोटी-सी वस्तु — फटा जूता — पूरे निबंध का केंद्रीय प्रतीक बन जाता है।
6. भाषा-शैली
परसाई जी की भाषा-शैली इस निबंध में बेहद प्रभावशाली है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ:
- सरल बोलचाल की हिंदी: भाषा इतनी सहज है कि पाठक को लगता है जैसे कोई दोस्त बात कर रहा हो।
- व्यंग्यात्मक शैली: हर वाक्य में एक अलग ही छुपा हुआ अर्थ है। सतह पर सरल, भीतर से गहरा।
- काल्पनिक संवाद: परसाई जी प्रेमचंद से मानो बात कर रहे हों — यह शैली पाठक को तुरंत जोड़ लेती है।
- प्रश्नात्मक शैली: "जूते नए क्यों नहीं पहने?" जैसे प्रश्न पाठक को सोचने पर मजबूर करते हैं।
- मुहावरेदार भाषा: "इज्जत की धज्जियाँ", "माथे पर बल" जैसे प्रयोग भाषा को जीवंत बनाते हैं।
- आत्मकथात्मक पुट: लेखक खुद को भी कहानी में शामिल करते हैं जिससे विश्वसनीयता बढ़ती है।
- लघु वाक्य-विन्यास: छोटे-छोटे वाक्य व्यंग्य को और तीखा बनाते हैं।
- भावात्मक भाषा: प्रेमचंद के प्रति गहरी श्रद्धा भाषा में झलकती है।
7. कठिन शब्द और उनके अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| व्यंग्य | कटाक्ष, तंज — किसी की बुराई को हँसी में कहना |
| विडंबना | विरोधाभासी या दुखद स्थिति जो हँसाती भी है और रुलाती भी |
| आडंबर | दिखावा, बाहरी भड़क-दिखावट |
| आत्मसम्मान | खुद की इज्जत, स्वाभिमान |
| प्रतीक | किसी बड़े भाव या विचार को व्यक्त करने वाली वस्तु या चिह्न |
| संघर्ष | कठिनाइयों से लड़ते हुए आगे बढ़ना |
| समझौता | किसी बात को मान लेना, अपने सिद्धांत छोड़ना |
| बेपरवाही | लापरवाही, किसी चीज की परवाह न करना |
| सादगी | सरलता, बिना दिखावे का जीवन |
| दरिद्रता | गरीबी, आर्थिक तंगी |
| उपेक्षा | अनदेखी करना, ध्यान न देना |
| कटाक्ष | चुभने वाली बात, व्यंग्यपूर्ण टिप्पणी |
| शिवरानी देवी | प्रेमचंद की पत्नी जो तस्वीर में उनके साथ हैं |
| साहित्यकार | लेखक, कवि — जो साहित्य रचता है |
| जीवट | साहस, कठिन परिस्थितियों में भी डटे रहने का स्वभाव |
| मुहावरा | ऐसा वाक्यांश जिसका अर्थ शाब्दिक नहीं बल्कि लाक्षणिक होता है |
8. NCERT प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. हरिशंकर परसाई ने प्रेमचंद की जो तस्वीर खींची है वह तस्वीर के बारे में हमारे दृष्टिकोण से किस अर्थ में भिन्न है?
प्रश्न 2. सही कहते हैं लोग, मेरे मोजे की तो जुराब भी नहीं — इस कथन में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।
प्रश्न 3. तुम्हारी यह व्यंग्य रचना प्रेमचंद के प्रति श्रद्धा और व्यंग्य का अनोखा संयोग है — सिद्ध कीजिए।
प्रश्न 4. प्रेमचंद के फटे जूते का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?
प्रश्न 5. क्या आप परसाई जी से सहमत हैं कि आज के समाज में लोग दिखावे को ज्यादा महत्त्व देते हैं?
प्रश्न 6. निबंध में परसाई जी ने किसे बड़ा बताया है — प्रेमचंद की जूते की जोड़ी को या उनके व्यक्तित्व को? क्यों?
9. केंद्रीय भाव एवं मुख्य बिंदु (त्वरित पुनरावृत्ति)
- यह निबंध व्यंग्यात्मक है — हँसाते हुए समाज की कमजोरियाँ उजागर करता है।
- तस्वीर में फटे जूते ही निबंध का केंद्र हैं।
- परसाई जी ने काल्पनिक संवाद की अनोखी शैली प्रयोग की है।
- फटे जूते = संघर्ष + ईमानदारी + सादगी + स्वाभिमान।
- समाज का व्यंग्य — दिखावे और झूठी इज्जत पर चोट।
- प्रेमचंद की महानता उनकी वेशभूषा में नहीं, उनके विचारों और कर्मों में है।
- परसाई जी का आत्म-व्यंग्य निबंध को और ईमानदार बनाता है।
- भाषा — सरल, बोलचाल, मुहावरेदार — लेकिन अर्थ गहरा।
- प्रेमचंद
- हरिशंकर परसाई
- हजारीप्रसाद द्विवेदी
- रामचंद्र शुक्ल
- उनकी माँ
- उनकी बेटी
- शिवरानी देवी (पत्नी)
- उनकी बहन
- केवल गरीबी के
- प्रेमचंद की लापरवाही के
- संघर्ष, ईमानदारी और स्वाभिमान के
- समाज की उन्नति के
- वर्णनात्मक
- व्यंग्यात्मक और काल्पनिक संवाद शैली
- भावात्मक
- विश्लेषणात्मक
- 1975
- 1980
- 1982
- 1990
- लापरवाही
- गरीबी और शर्म
- आत्मसम्मान और बेपरवाही (सकारात्मक अर्थ में)
- अहंकार
- केवल प्रेमचंद पर
- केवल गरीबों पर
- दिखावेबाज समाज और खुद पर भी
- केवल नेताओं पर
- हरिशंकर प्रसाद
- धनपत राय श्रीवास्तव
- नवाब राय
- माधवराव सप्रे
- प्रेमचंद का जूता फटा होना
- इतने बड़े साहित्यकार के पास ढंग के जूते भी नहीं थे
- परसाई जी का निबंध लिखना
- तस्वीर का काला-सफेद होना
- इलाहाबाद
- लखनऊ
- होशंगाबाद (मध्यप्रदेश)
- जबलपुर
- कविता
- नाटक
- व्यंग्यात्मक निबंध
- उपन्यास
- प्रेमचंद बहुत चलते थे
- जूते सस्ते थे
- जीवन में संघर्ष करने से ही टूट-फूट होती है और यही महानता है
- बाजार में अच्छे जूते नहीं मिलते थे
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