सवैये

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CLASS IX Hindi ~5 अंक Ch 9 of 16
सवैये

Class 9 · Hindi · NCERT chapter notes · Akanksha Classes

त्वरित सारांश (Snapshot)
  • कवि: रसखान — मुस्लिम कृष्ण-भक्त कवि, ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवियों में गिने जाते हैं।
  • रचना: दो सवैये — दोनों में कवि की ब्रज-भूमि और कृष्ण के प्रति अगाध प्रेम व्यक्त हुआ है।
  • पहला सवैया: कवि अगले जन्म में ब्रज के पत्थर, पशु, पक्षी या मनुष्य — किसी भी रूप में जन्म लेना चाहते हैं, बस कृष्ण की लीलाभूमि में रहना है।
  • दूसरा सवैया: कवि कृष्ण की संगति में रहने के लिए गोवर्धन पर्वत, यमुना तट और ब्रज की गायों के साथ रहने की इच्छा व्यक्त करते हैं — तीनों लोकों का राज्य, आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ भी इस प्रेम के सामने तुच्छ हैं।
  • प्रमुख अलंकार: अनुप्रास, रूपक, अतिशयोक्ति।
  • बोर्ड महत्व: ~5 अंक — भावार्थ, काव्य सौंदर्य और प्रश्नोत्तर से प्रश्न आते हैं।
विस्तृत नोट्स

1. कवि परिचय — रसखान

जन्म: लगभग 1548 ई. (कुछ विद्वान 1533 ई. मानते हैं)। मृत्यु: लगभग 1628 ई.। रसखान का वास्तविक नाम सैयद इब्राहीम था। वे दिल्ली के एक सम्पन्न पठान परिवार में पैदा हुए थे।

कृष्ण-भक्ति: रसखान एक मुस्लिम होते हुए भी कृष्ण की अनन्य भक्ति में रम गए। उन्हें "मुस्लिम कृष्ण-भक्त" कहा जाता है। वे वृन्दावन आकर रहने लगे और वहीं साहित्य-साधना की। महाकवि गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य बने और पुष्टिमार्ग की भक्ति धारा में दीक्षित हुए।

भाषा: रसखान ने ब्रजभाषा में काव्य रचना की। उनकी भाषा सरल, रसमयी और भावपूर्ण है। उनके काव्य में माधुर्य रस की प्रधानता है। उन्होंने फारसी-उर्दू की मिश्रित नहीं, बल्कि शुद्ध ब्रजभाषा को अपनाया।

प्रमुख रचनाएँ:

  • प्रेमवाटिका — दोहों का संग्रह, कृष्ण-प्रेम का वर्णन।
  • सुजान रसखान — सवैये और कवित्त का संग्रह। यही उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना है।
  • दानलीला — कृष्ण की दान-लीला का वर्णन।

साहित्यिक महत्व: रसखान के काव्य में भक्ति और श्रृंगार का अनूठा संगम है। वे कृष्ण की बाल-लीला, माधुर्य-भक्ति और ब्रज की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन अत्यंत हृदयग्राही ढंग से करते हैं। उनकी तुलना सूरदास से की जाती है — दोनों ने कृष्ण की भक्ति में अपना सर्वस्व समर्पित किया। रसखान की विशेषता यह है कि एक मुस्लिम होते हुए भी उन्होंने हिन्दी साहित्य और कृष्ण-भक्ति को उतना ही समृद्ध किया जितना किसी भी हिन्दू कवि ने। उनकी भक्ति में कोई सांप्रदायिक भेद नहीं था — प्रेम ही उनका धर्म था।

2. सवैयों का मूल पाठ एवं भावार्थ

सवैया — 1 (ब्रज में जन्म लेने की इच्छा)

मानुष हौं तो वही रसखान बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पशु हौं तो कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन।।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरंदर-धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल-कदंब की डारन।।

कठिन शब्दों के अर्थ:

  • मानुष — मनुष्य।
  • हौं — हूँ (ब्रजभाषा का रूप)।
  • बसौं — बसूँ, रहूँ।
  • ग्वारन — ग्वाले (गोपालक), गाय चराने वाले।
  • चरौं — चरूँ।
  • नित — नित्य, हमेशा।
  • धेनु — गाय।
  • मँझारन — बीच में।
  • पाहन — पत्थर।
  • गिरि — पर्वत, यहाँ गोवर्धन पर्वत।
  • धर्यो — धारण किया, उठाया।
  • कर — हाथ।
  • छत्र — छाता।
  • पुरंदर — इंद्र देवता।
  • खग — पक्षी।
  • बसेरो — निवास, घर।
  • कालिंदी — यमुना नदी (कालिंद पर्वत से निकली, इसीलिए कालिंदी)।
  • कूल — तट, किनारा।
  • कदंब — कदम्ब का पेड़ (ब्रज में बहुतायत से पाया जाता है)।
  • डारन — शाखाओं पर (डाल पर)।

भावार्थ: इस सवैये में रसखान अपने अगले जन्म की कल्पना करते हुए चार संभावनाएँ रखते हैं और हर संभावना में ब्रज और कृष्ण से जुड़ाव चाहते हैं:

  • यदि मनुष्य जन्म मिले — तो गोकुल गाँव में ब्रज के ग्वालों के बीच रहूँगा। यह वह भूमि है जहाँ श्रीकृष्ण ने बाल्यावस्था बिताई और ग्वालों के साथ खेले।
  • यदि पशु जन्म मिले — तो नंद बाबा की गायों के बीच चरूँगा। कृष्ण ने उन्हीं गायों को चराया था, उनके हाथ का स्पर्श मिला था — वे गायें भी धन्य हैं।
  • यदि पत्थर बनना पड़े — तो उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनूँगा, जिसे कृष्ण ने इंद्र (पुरंदर) के भारी वर्षा और क्रोध से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए अपने हाथ पर छाते की तरह उठाया था। उस पर्वत को कृष्ण के हाथ का स्पर्श मिला — इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा?
  • यदि पक्षी जन्म मिले — तो यमुना नदी (कालिंदी) के तट पर कदम्ब की डाली पर बसेरा करूँगा। कदम्ब के पेड़ पर कृष्ण बाँसुरी बजाते थे, यमुना के किनारे उनकी रासलीला होती थी।

केंद्रीय भाव: कवि का कृष्ण-प्रेम इतना गहरा है कि वे किसी भी योनि में जन्म लेकर कृष्ण की लीला-भूमि से जुड़े रहना चाहते हैं। चाहे वे मनुष्य हों, पशु हों, पत्थर हों या पक्षी — हर रूप में ब्रज और कृष्ण ही उनका एकमात्र आश्रय है।

सवैया — 2 (कृष्ण की संगति में रहने की लालसा — त्याग और समर्पण)

या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवौ निधि को सुख नंद की गाय चराय बिसारौं।।
रसखान कबौ इन आँखिन सों ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं।।

कठिन शब्दों के अर्थ:

  • या — इस (इस ब्रजभाषा में)।
  • लकुटी — छोटी लाठी (कृष्ण की छोटी-सी लकड़ी)।
  • अरु — और।
  • कामरिया — छोटा कम्बल (कृष्ण की कमली/छोटी-सी कामरी)।
  • तिहूँ पुर — तीनों लोक (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल)।
  • तजि डारौं — त्याग दूँ, छोड़ दूँ।
  • आठहुँ सिद्धि — योग की आठ सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व)।
  • नवौ निधि — नौ प्रकार के खजाने/धन (कुबेर की नौ निधियाँ)।
  • बिसारौं — भूल जाऊँ।
  • कबौ — कभी।
  • आँखिन सों — आँखों से।
  • बन बाग तड़ाग — वन, बगीचे और तालाब।
  • निहारौं — देखूँ।
  • कोटिक — करोड़ों।
  • कलधौत — सोना (स्वर्ण)।
  • धाम — महल, घर।
  • करील — एक झाड़ीदार पेड़ (ब्रज में पाया जाने वाला)।
  • कुंजन — कुंज (वृक्षों की घनी छाया वाले स्थान, लताकुंज)।
  • वारौं — न्यौछावर करूँ, कुर्बान करूँ।

भावार्थ: इस सवैये में रसखान की भक्ति और त्याग-भावना और भी तीव्र हो उठती है। चार पंक्तियों में चार भाव:

  • पंक्ति 1: कृष्ण की वह साधारण-सी लाठी और कम्बल (कामरिया) के लिए मैं तीनों लोकों का राज्य त्यागने को तैयार हूँ। सांसारिक सत्ता का सर्वोच्च रूप — तीनों लोकों का राजपाट — कृष्ण की प्रिय वस्तुओं के सामने तुच्छ है।
  • पंक्ति 2: आठों योग-सिद्धियाँ और नौ प्रकार की निधियाँ — जिन्हें पाने के लिए लोग जीवन भर तपस्या करते हैं — उन सबको मैं नंद बाबा की गायें चराकर भूल जाना चाहता हूँ। अर्थात् कृष्ण की सेवा में लीन होना ही सच्चा सुख है।
  • पंक्ति 3: कवि विनती करते हैं — हे प्रभु, कभी तो इन आँखों से ब्रज के वन, बाग और तालाब देखने का सौभाग्य मिले। यह दर्शन-लालसा भक्त के हृदय की सबसे कोमल और गहरी भावना है।
  • पंक्ति 4: करोड़ों सोने के महलों को मैं ब्रज के करील की कुंजों पर न्यौछावर कर दूँ — ब्रज की वह साधारण झाड़ियाँ भी सोने के महलों से अधिक प्रिय और पवित्र हैं क्योंकि वे कृष्ण की लीलाभूमि का हिस्सा हैं।

केंद्रीय भाव: इस सवैये में रसखान ने यह स्पष्ट किया है कि कृष्ण के प्रेम के सामने सांसारिक वैभव, शक्ति, ऐश्वर्य और योग की उपलब्धियाँ — सब तुच्छ हैं। त्याग और प्रेम की यह पराकाष्ठा भक्ति काव्य की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है।

3. मुख्य विषय — कृष्ण-भक्ति और ब्रज-प्रेम

रसखान के इन सवैयों के दो मुख्य विषय हैं:

(क) कृष्ण-भक्ति (Krishna Bhakti): रसखान का कृष्ण-प्रेम किसी सीमा में नहीं बँधता। वे कृष्ण की लाठी और कम्बल के लिए तीनों लोकों का राज्य, आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ छोड़ने को तैयार हैं। यह सांसारिक वस्तुओं का त्याग और ईश्वर में पूर्ण समर्पण की भावना माधुर्य-भक्ति का प्रतीक है। रसखान की भक्ति में दास्य भाव (सेवक-भाव) और सख्य भाव (मित्र-भाव) दोनों दिखते हैं।

(ख) ब्रज-प्रेम (Love for Braj Bhoomi): रसखान केवल कृष्ण से नहीं, उनकी लीला-भूमि ब्रज से भी गहराई से प्रेम करते हैं। वे ब्रज के पत्थर, पशु, पक्षी तक बनकर वहाँ रहना चाहते हैं। ब्रज की नदी (यमुना), वन, बाग, तालाब और करील के कुंज — सब उनके लिए स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। ब्रज-भूमि के प्रति यह लगाव उनकी कृष्ण-भक्ति का ही विस्तार है।

(ग) त्याग और समर्पण: दूसरे सवैये में त्याग की भावना चरम पर है। सांसारिक उपलब्धियों — राज, सिद्धि, निधि, सोने के महल — सब को ब्रज की झाड़ियों पर न्यौछावर करने की बात निस्स्वार्थ भक्ति की पराकाष्ठा है।

(घ) प्रकृति-प्रेम: कवि ने ब्रज की प्रकृति — गोकुल के वन, यमुना तट, कदम्ब के पेड़, करील के कुंज, बाग और तालाब — का सुंदर चित्रण किया है। यह प्रकृति-चित्रण कृष्ण-भक्ति से जुड़ा हुआ है।

4. अलंकार (Alankar)

(क) अनुप्रास अलंकार — जब एक ही वर्ण की आवृत्ति बार-बार हो:

  • "सौं ्रज ोकुल ाँव के ्वारन" — 'ब' और 'ग' वर्ण की आवृत्ति।
  • "ाग तड़ाग" — 'ब' वर्ण की आवृत्ति।
  • "ालिंदी-ूल-दंब की ुंजन" — 'क' वर्ण की पुनरावृत्ति, मधुर ध्वनि-सौंदर्य।
  • "रील के ुंजन" — 'क' वर्ण की आवृत्ति।
  • "ोटिक ए लधौत के धाम रील के ुंजन" — 'क' वर्ण की सुंदर आवृत्ति।

(ख) रूपक अलंकार — जब उपमेय में उपमान का आरोप किया जाए (बिना 'सा', 'जैसा' के):

  • "गिरि छत्र" — गोवर्धन पर्वत को छाता (छत्र) कह दिया गया है। "धर्यो कर छत्र पुरंदर-धारन" — पर्वत ही छाता बन गया।

(ग) अतिशयोक्ति अलंकार — जब किसी बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाए:

  • "कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं" — करोड़ों सोने के महलों को करील के कुंज पर न्यौछावर करना — यह प्रेम की अतिशयोक्ति है।
  • "आठहुँ सिद्धि नवौ निधि" — आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ त्यागने की बात भी प्रेम की अतिशयोक्ति है।
  • "राज तिहूँ पुर को तजि डारौं" — तीनों लोकों का राज्य छोड़ने की बात भी अतिशयोक्ति है।

(घ) उपमा अलंकार:

  • करोड़ों सोने के महलों की तुलना करील के कुंजों से की गई है — ब्रज के कुंज सोने के महलों से भी श्रेष्ठ हैं।

5. काव्य सौंदर्य

(क) भाषा-सौंदर्य: रसखान की भाषा ब्रजभाषा है जो अत्यंत मधुर, लयात्मक और संगीतात्मक है। 'हौं', 'चरौं', 'बसेरो', 'निहारौं', 'वारौं', 'तजि डारौं' जैसे शब्द ब्रजभाषा की मिठास के प्रतीक हैं। भाषा में प्रवाह और सरलता है।

(ख) छंद-सौंदर्य: सवैया छंद — यह मात्रिक छंद है जिसमें संगीत का स्वाभाविक प्रवाह होता है। प्रत्येक चरण में 22 या 23 वर्ण होते हैं और अंत में 'रन' (लघु-गुरु-गुरु) की आवृत्ति होती है। यह छंद भक्ति एवं श्रृंगार काव्य में विशेष रूप से प्रयुक्त होता है। लंबी पंक्तियाँ भाव को विस्तार देती हैं।

(ग) रस: इन सवैयों में भक्ति रस (शांत रस का अंग) की प्रधानता है। कृष्ण के प्रति अनुराग और समर्पण की भावना माधुर्य रस उत्पन्न करती है।

(घ) बिंब-सौंदर्य (Imagery):

  • गोवर्धन पर्वत को कृष्ण के हाथ में छाते की तरह — दृश्य बिंब (Visual Imagery)।
  • यमुना के तट पर कदम्ब की डाली पर पक्षी का बसेरा — प्राकृतिक बिंब।
  • नंद की गायों के बीच चरना — ग्रामीण जीवन का बिंब।
  • ब्रज के वन, बाग और तालाब — प्रकृति चित्रण, प्रेरणादायक बिंब।
  • करील के कुंजों में रहना — साधारण जीवन का बिंब जो प्रेम में महान बन जाता है।

(ङ) भाव-सौंदर्य: इन सवैयों में कवि ने अपने जन्म-जन्मांतर के सपने को व्यक्त किया है। चाहे किसी भी रूप में जन्म हो — मनुष्य, पशु, पक्षी या पत्थर — कृष्ण की भूमि ब्रज से जुड़े रहने की इच्छा उनकी भक्ति की गहराई को दर्शाती है। त्याग की भावना — तीनों लोकों का राज्य, आठ सिद्धियाँ, नौ निधियाँ और करोड़ों महल — यह सब छोड़ने की तैयारी कृष्ण-प्रेम की निस्स्वार्थता को प्रकट करती है।

(च) विशेष तथ्य — सवैया छंद की पहचान: इस छंद की पहचान यह है कि इसकी हर पंक्ति में अंत में 'न' या 'र' की ध्वनि दोहराती है — ग्वारन, मँझारन, धारन, डारन। यह अंतानुप्रास छंद को और अधिक संगीतमय बनाती है।

6. शब्द अर्थ कोश (Word Meanings)

शब्दअर्थ
मानुषमनुष्य
हौंहूँ (ब्रजभाषा)
ग्वारनग्वाले, गोपालक
धेनुगाय
मँझारनबीच में
पाहनपत्थर
गिरिपर्वत (यहाँ गोवर्धन)
धर्योधारण किया, उठाया
पुरंदरइंद्र देवता
खगपक्षी
कालिंदीयमुना नदी
कूलतट, किनारा
कदंबकदम्ब का पेड़
डारनडाल, शाखाएँ
लकुटीछोटी लाठी
कामरियाछोटा कम्बल/कामरी
तिहूँ पुरतीनों लोक
तजि डारौंत्याग दूँ
आठहुँ सिद्धियोग की आठ सिद्धियाँ
नवौ निधिकुबेर के नौ खजाने
बिसारौंभूल जाऊँ
कबौकभी
तड़ागतालाब
निहारौंदेखूँ
कलधौतसोना
करीलब्रज का एक झाड़ीदार पेड़
कुंजनकुंज (वृक्षों की छाया वाले स्थान)
वारौंन्यौछावर करूँ

7. NCERT प्रश्नोत्तर

प्र. 1. ब्रजभूमि के प्रति कवि का प्रेम किन-किन रूपों में अभिव्यक्त हुआ है?

उत्तर: रसखान ने पहले सवैये में अपने अगले जन्म की कल्पना करते हुए ब्रज-प्रेम को चार रूपों में व्यक्त किया है:
  • मनुष्य रूप में — ब्रज के गोकुल गाँव में ग्वाले के रूप में जन्म लेंगे।
  • पशु रूप में — नंद बाबा की गायों के बीच चरेंगे।
  • पत्थर रूप में — उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनेंगे जिसे कृष्ण ने उठाया था।
  • पक्षी रूप में — यमुना तट पर कदम्ब की डाली पर बसेरा करेंगे।
इस प्रकार हर जन्म, हर रूप में ब्रज-भूमि से जुड़े रहने की इच्छा कवि के गहरे ब्रज-प्रेम को दर्शाती है।

प्र. 2. कवि का ब्रज के वन, बाग और तालाब को निहारने के लिए आतुर मन क्यों है?

उत्तर: रसखान कृष्ण के अनन्य भक्त हैं और ब्रज कृष्ण की लीला-भूमि है। ब्रज के वन, बाग और तालाब — ये सभी कृष्ण की बाल-लीलाओं और रास-लीलाओं से जुड़े हैं। इन्हें देखने में कवि को कृष्ण का सान्निध्य अनुभव होता है। इसीलिए उनका मन इन स्थानों को देखने के लिए आतुर रहता है। ये स्थान उनके लिए सोने के महलों से भी बढ़कर हैं।

प्र. 3. "या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं" — इस पंक्ति में कवि की क्या भावना है?

उत्तर: इस पंक्ति में कवि रसखान यह कह रहे हैं कि कृष्ण की वह छोटी-सी लाठी (लकुटी) और कम्बल (कामरिया) के लिए वे तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) का राज्य त्यागने को तैयार हैं। इस भावना में कवि का कृष्ण-प्रेम और सांसारिक वस्तुओं से वैराग्य व्यक्त होता है। सांसारिक ऐश्वर्य — चाहे कितना भी बड़ा हो — कृष्ण की प्रेम-वस्तुओं के सामने कुछ नहीं है। यह निस्स्वार्थ प्रेम और सम्पूर्ण समर्पण की भावना है।

प्र. 4. पहले सवैये में रसखान किन-किन प्राकृतिक तत्वों का उल्लेख करते हैं?

उत्तर: पहले सवैये में रसखान निम्नलिखित प्राकृतिक तत्वों का उल्लेख करते हैं — (1) गोकुल का गाँव और वहाँ के ग्वाले, (2) नंद बाबा की गायें, (3) गोवर्धन पर्वत, (4) यमुना नदी (कालिंदी) का तट, (5) कदम्ब का पेड़ और उसकी डालियाँ। ये सभी कृष्ण की लीला-भूमि से जुड़े प्राकृतिक तत्व हैं।

प्र. 5. दूसरे सवैये में कवि ने किन-किन वस्तुओं का त्याग करने की बात कही है और क्यों?

उत्तर: दूसरे सवैये में कवि रसखान ने निम्नलिखित वस्तुओं का त्याग करने की बात कही है — (1) तीनों लोकों का राज्य, (2) आठों योग-सिद्धियाँ, (3) नौ प्रकार की निधियाँ (खजाने), (4) करोड़ों सोने के महल। इन सबका त्याग इसलिए कि वे कृष्ण की लाठी और कम्बल पाना चाहते हैं, नंद की गायें चराना चाहते हैं और ब्रज के करील के कुंजों में रहना चाहते हैं। कृष्ण-प्रेम के सामने संसार का सारा वैभव तुच्छ है — यही इस सवैये का केंद्रीय भाव है।
अभ्यास MCQ
1. रसखान किस धर्म के कवि थे, फिर भी किसके अनन्य भक्त थे?
  1. हिन्दू धर्म — राम के भक्त
  2. मुस्लिम धर्म — कृष्ण के भक्त
  3. बौद्ध धर्म — बुद्ध के भक्त
  4. जैन धर्म — महावीर के भक्त
उत्तर: (B) रसखान मुस्लिम धर्म के थे किन्तु कृष्ण के अनन्य भक्त थे। उन्हें "मुस्लिम कृष्ण-भक्त" कहा जाता है।
2. पहले सवैये में कवि अगले जन्म में ग्वाले के रूप में कहाँ रहना चाहते हैं?
  1. मथुरा में
  2. वृन्दावन में
  3. गोकुल गाँव में
  4. द्वारका में
उत्तर: (C) कवि गोकुल गाँव में ब्रज के ग्वालों के बीच रहना चाहते हैं।
3. "पाहन हौं तो वही गिरि को" — यहाँ 'गिरि' से क्या तात्पर्य है?
  1. हिमालय पर्वत
  2. विंध्याचल पर्वत
  3. गोवर्धन पर्वत
  4. मेरु पर्वत
उत्तर: (C) यहाँ 'गिरि' से गोवर्धन पर्वत तात्पर्य है जिसे कृष्ण ने इंद्र के क्रोध से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए उठाया था।
4. रसखान पक्षी बनने पर कहाँ बसेरा करना चाहते हैं?
  1. हिमालय की चोटी पर
  2. यमुना तट पर कदम्ब की डाली पर
  3. गोकुल के महल में
  4. मथुरा के बाग में
उत्तर: (B) कवि यमुना तट (कालिंदी-कूल) पर कदम्ब की डाली पर बसेरा करना चाहते हैं।
5. 'लकुटी' और 'कामरिया' किनकी वस्तुएँ हैं?
  1. नंद बाबा की
  2. राम की
  3. कृष्ण की
  4. बलराम की
उत्तर: (C) लकुटी (लाठी) और कामरिया (कम्बल) कृष्ण की वस्तुएँ हैं, जिनके लिए रसखान तीनों लोकों का राज्य छोड़ने को तैयार हैं।
6. रसखान 'आठहुँ सिद्धि नवौ निधि' किसके लिए भूल जाना चाहते हैं?
  1. तीनों लोकों के राज के लिए
  2. नंद की गाय चराने के लिए
  3. यमुना स्नान के लिए
  4. मोक्ष प्राप्ति के लिए
उत्तर: (B) कवि नंद की गायें चराने के सुख के लिए आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ भूल जाना चाहते हैं।
7. "कोटिक ए कलधौत के धाम" — यहाँ 'कलधौत' का अर्थ है:
  1. चाँदी
  2. ताँबा
  3. लोहा
  4. सोना
उत्तर: (D) 'कलधौत' का अर्थ सोना (स्वर्ण) है।
8. "कालिंदी-कूल-कदंब की डारन" — में 'कालिंदी' किसका नाम है?
  1. गंगा नदी
  2. यमुना नदी
  3. सरस्वती नदी
  4. गोमती नदी
उत्तर: (B) 'कालिंदी' यमुना नदी का दूसरा नाम है।
9. "कालिंदी-कूल-कदंब की डारन" में प्रमुख अलंकार कौन सा है?
  1. यमक
  2. श्लेष
  3. अनुप्रास
  4. उपमा
उत्तर: (C) 'क' वर्ण की बार-बार आवृत्ति के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
10. रसखान के सवैयों में किस रस की प्रधानता है?
  1. वीर रस
  2. करुण रस
  3. भक्ति (शांत) रस
  4. हास्य रस
उत्तर: (C) रसखान के सवैयों में भक्ति रस (शांत रस का अंग) की प्रधानता है। कृष्ण के प्रति समर्पण और अनुराग माधुर्य रस उत्पन्न करता है।
11. "गिरि छत्र" में कौन-सा अलंकार है?
  1. अनुप्रास
  2. रूपक
  3. उपमा
  4. उत्प्रेक्षा
उत्तर: (B) 'गिरि' (पर्वत) को 'छत्र' (छाता) कहना रूपक अलंकार है — उपमेय पर उपमान का आरोप।
12. रसखान की प्रमुख रचना कौन-सी है जिसमें सवैये संकलित हैं?
  1. रामचरितमानस
  2. सुजान रसखान
  3. पद्मावत
  4. बीजक
उत्तर: (B) 'सुजान रसखान' रसखान की प्रमुख रचना है जिसमें सवैये और कवित्त संकलित हैं।
पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQ)
PYQ-1. निम्नलिखित सवैये का भावार्थ स्पष्ट कीजिए — "मानुष हौं तो वही रसखान बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।" (CBSE, 3 अंक)
उत्तर: कवि रसखान कहते हैं — यदि अगले जन्म में मुझे मनुष्य का जन्म मिले, तो मैं ब्रज के गोकुल गाँव में ग्वालों (गोपालकों) के बीच जन्म लेना चाहता हूँ। गोकुल वह स्थान है जहाँ कृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था बिताई थी और जहाँ के ग्वाले कृष्ण के सबसे प्रिय सखा थे। यहाँ कवि की ब्रज-भूमि के प्रति अगाध श्रद्धा और कृष्ण-सान्निध्य की तीव्र लालसा व्यक्त हुई है।
PYQ-2. रसखान 'पाहन' (पत्थर) बनना चाहें तो किस पर्वत का पत्थर बनना चाहते हैं और क्यों? (CBSE, 2 अंक)
उत्तर: रसखान गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनना चाहते हैं। क्योंकि कृष्ण ने इंद्र के क्रोध और भारी वर्षा से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए इसी गोवर्धन पर्वत को अपनी उँगली पर उठाया था। उस पर्वत को कृष्ण का स्पर्श मिला था, इसलिए वह पत्थर भी पवित्र और अत्यंत प्रिय है।
PYQ-3. "आठहुँ सिद्धि नवौ निधि को सुख" से कवि का क्या आशय है? (CBSE, 2 अंक)
उत्तर: यहाँ कवि का आशय है कि योग की आठ सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा आदि) और कुबेर की नौ निधियाँ (नौ प्रकार के दिव्य खजाने) — ये सब सांसारिक उपलब्धियाँ एवं ऐश्वर्य के प्रतीक हैं। कवि कहते हैं कि नंद की गायें चराने के आनंद के सामने इन सभी का सुख तुच्छ है। कृष्ण की भक्ति और सेवा से बड़ी कोई उपलब्धि नहीं।
PYQ-4. रसखान के सवैयों में किस छंद का प्रयोग किया गया है? उसकी एक विशेषता बताइए। (CBSE, 1 अंक)
उत्तर: रसखान ने सवैया छंद का प्रयोग किया है। इस छंद की विशेषता यह है कि इसमें प्रत्येक चरण में लय और संगीत का सुंदर प्रवाह होता है तथा यह भक्ति और श्रृंगार काव्य के लिए विशेष रूप से उपयुक्त छंद माना जाता है।
PYQ-5. "कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं" — इस पंक्ति का आशय स्पष्ट करते हुए इसमें निहित भाव-सौंदर्य बताइए। (CBSE, 3 अंक)
आशय: रसखान कहते हैं कि वे करोड़ों सोने के महलों को ब्रज के करील (एक साधारण झाड़ीदार पेड़) के कुंजों (घनी झाड़ियों) पर न्यौछावर कर देंगे — अर्थात् ब्रज की वह साधारण झाड़ियाँ सोने के महलों से भी अधिक मूल्यवान हैं। भाव-सौंदर्य: इस पंक्ति में कवि का ब्रज-प्रेम और त्याग-भावना अपनी चरम सीमा पर है। भक्त के लिए भगवान की लीलाभूमि का कोना-कोना स्वर्ण के महलों से भी श्रेष्ठ है। यह पंक्ति भक्ति की निस्स्वार्थता और पवित्रता को उजागर करती है। यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार भी है।
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