- कवि: कबीरदास — निर्गुण भक्ति धारा के सबसे प्रमुख संत-कवि एवं समाज-सुधारक।
- साखी (साक्षी = गवाह) — दोहा छंद में अनुभव-जनित ज्ञान, नैतिकता और आत्म-जागरण की बातें।
- सबद — संगीतात्मक पद जिसमें ईश्वर-प्रेम, माया-त्याग और बाह्य आडंबर-विरोध का संदेश।
- भाषा: सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी) — हिंदी, पंजाबी, राजस्थानी, अवधी और अरबी-फ़ारसी का मिश्रण।
- मुख्य विचार: निर्गुण ईश्वर, समानता, माया-त्याग, गुरु-महिमा, अहंकार-त्याग, प्रेम-भक्ति।
- बोर्ड वेटेज: ~5 अंक — भावार्थ, प्रश्नोत्तर और काव्य-सौंदर्य से प्रश्न आते हैं।
1. कवि परिचय — कबीरदास
जन्म: सन् 1398 ई. (अनुमानित), काशी (वाराणसी)। मृत्यु: सन् 1518 ई., मगहर (उत्तर प्रदेश)।
कबीर का लालन-पालन एक मुस्लिम जुलाहा परिवार (नीरू और नीमा) ने किया। उनके गुरु: स्वामी रामानंद थे। कबीर ने किसी मदरसे या पाठशाला में शिक्षा नहीं ली — स्वयं कहा: "मसि कागद छुयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।" वे व्यावहारिक रूप से अनपढ़ थे, परंतु उनका ज्ञान अनुभव-जनित और अत्यंत गहरा था।
साहित्यिक महत्त्व: कबीर हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की निर्गुण शाखा (ज्ञानमार्गी शाखा) के प्रमुख कवि हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में संकलित हैं — इसके तीन भाग हैं: साखी, सबद और रमैनी।
कबीर का दर्शन:
- ईश्वर एक है — वह निर्गुण (रूप, गुण, आकार से परे), निराकार और सर्वव्यापी है।
- मूर्तिपूजा, जाति-भेद, बाहरी कर्मकांड का दृढ़ विरोध।
- हिंदू और मुसलमान दोनों की कुरीतियों पर सीधा प्रहार।
- गुरु को ईश्वर से भी बड़ा माना — गुरु ही ज्ञान का द्वार है।
- प्रेम को ही सच्ची भक्ति माना — "ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय।"
2. साखियाँ — प्रत्येक दोहे का भावार्थ
NCERT पाठ्यपुस्तक (क्षितिज-1) में कबीर की आठ साखियाँ (दोहे) सम्मिलित हैं। नीचे प्रत्येक का पाठ, शब्दार्थ और भावार्थ दिया गया है।
दोहा: जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं।।
शब्दार्थ: हरि = ईश्वर; मैं = अहंकार; प्रेम गली = प्रेम की गली; साँकरी = संकरी (तंग); तामें = उसमें; दो न समाहिं = दो नहीं समा सकते।
भावार्थ: जब तक मेरे भीतर अहंकार (मैं-पन) था, तब तक ईश्वर नहीं मिले। जब से ईश्वर मिले, तब से अहंकार मिट गया। प्रेम की गली बहुत संकरी है — उसमें अहंकार और ईश्वर दोनों एक साथ नहीं समा सकते। अहंकार का त्याग ही परमात्मा को पाने का एकमात्र मार्ग है।
दोहा: बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि।
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।।
शब्दार्थ: अनमोल = अमूल्य; जानि = जानबूझकर; हिये = हृदय; तराजू = तराज़ू (तुला); तौलि के = तोलकर; मुख बाहर आनि = मुख से बाहर निकालना।
भावार्थ: वाणी अनमोल है — उसे वही व्यक्ति सही ढंग से बोल सकता है जो उसके महत्त्व को समझता है। पहले हृदय रूपी तराज़ू पर तोलकर देखो, तब मुख से बोलो। जो बात दूसरों को कष्ट दे, उसे बोलने से बचो।
दोहा: निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निरमल करै सुभाय।।
शब्दार्थ: निंदक = आलोचना करने वाला; नियरे = पास; आँगन कुटी छवाय = आँगन में झोपड़ी बनाकर; बिन पानी साबुन बिना = बिना पानी और साबुन के; निरमल = निर्मल (शुद्ध); सुभाय = स्वभाव।
भावार्थ: जो व्यक्ति हमारी आलोचना करता है, उसे अपने पास — यहाँ तक कि अपने आँगन में — रखो। वह बिना पानी और साबुन के ही हमारे स्वभाव को निर्मल (शुद्ध) कर देता है। अर्थात् निंदक हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधरने में मदद करता है — वही हमारा सच्चा हितैषी है।
दोहा: पाँणी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात।
देखत ही छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात।।
शब्दार्थ: पाँणी = पानी; केरा = का; बुदबुदा = बुलबुला; अस = ऐसा; मानुस = मनुष्य; जात = जाति / प्रकृति; परभात = प्रभात (सुबह)।
भावार्थ: मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले जैसा है — जिस तरह बुलबुला पल में बनता है और पल में फूट जाता है, उसी तरह मनुष्य भी क्षणभंगुर है। जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही मृत्यु आने पर यह जीवन समाप्त हो जाता है। अतः माया-मोह छोड़कर ईश्वर-भक्ति में लगो।
दोहा: बलिहारी गुर आपणे, दिउँड़ी कई बार।
जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी वार।।
शब्दार्थ: बलिहारी = न्योछावर; गुर = गुरु; दिउँड़ी = दिन में; कई बार = अनेक बार; जिनि = जिसने; मानिष = मनुष्य; देवता = दिव्य/देव-तुल्य; वार = देरी।
भावार्थ: कबीर कहते हैं — मैं अपने गुरु पर दिन में कई बार न्योछावर होता हूँ, जिन्होंने साधारण मनुष्य को देवता बना दिया और यह काम उन्होंने पल भर में कर दिया। गुरु का ज्ञान-दान सबसे बड़ा दान है।
दोहा: पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय।।
शब्दार्थ: पोथी = ग्रंथ / मोटी पुस्तक; मुआ = मर गया; पंडित = सच्चा ज्ञानी; आखर = अक्षर।
भावार्थ: बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़-पढ़कर लोग जीवन-भर पढ़ते रहे और अंत में मर भी गए, परंतु कोई सच्चा ज्ञानी न बन सका। जो "प्रेम" के ढाई अक्षर पढ़ (और समझ) लेता है, वही सच्चा पंडित (ज्ञानी) है। अनुभव-जनित प्रेम-ज्ञान पुस्तकीय ज्ञान से बहुत ऊँचा है।
दोहा: कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़ै बन माहिं।
ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखै नाहिं।।
शब्दार्थ: कस्तूरी = सुगंधित पदार्थ; कुंडलि = नाभि में; मृग = हिरन; बन = वन; माहिं = में; घट घट = हर शरीर में; राम = ईश्वर।
भावार्थ: कस्तूरी हिरन की नाभि में होती है, किंतु वह उसे वन-वन में ढूँढता फिरता है। इसी तरह ईश्वर हर प्राणी के हृदय में है, किंतु मनुष्य उन्हें मंदिर-मस्जिद में बाहर खोजता है। दुनिया अपने भीतर के राम को नहीं देखती।
दोहा: जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप।
जहाँ क्रोध तहाँ काल है, जहाँ क्षमा तहाँ आप।।
शब्दार्थ: दया = करुणा; धर्म = धर्म / सदाचार; लोभ = लालच; काल = मृत्यु / विनाश; क्षमा = माफ़ी; आप = ईश्वर स्वयं।
भावार्थ: जहाँ दया है वहाँ धर्म है; जहाँ लोभ है वहाँ पाप है; जहाँ क्रोध है वहाँ विनाश है; और जहाँ क्षमा है वहाँ स्वयं ईश्वर का वास है। यह साखी नैतिक जीवन की सरल किंतु गहरी परिभाषा है।
3. सबद — पदों का भावार्थ
NCERT पाठ्यपुस्तक में कबीर के दो सबद सम्मिलित हैं।
पद:
मोको कहाँ ढूँढ़े रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।
ना मैं देवल ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में।।
ना तो कौने क्रिया-कर्म में, नहीं योग बैराग में।
खोजी होय तो तुरतहिं मिलूँ, पल भर की तलास में।।
कहत कबीर सुनो भई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में।।
शब्दार्थ: मोको = मुझे; बंदे = हे इंसान; देवल = मंदिर; काबे = मक्का (काबा); कैलास = कैलाश पर्वत; क्रिया-कर्म = बाहरी धार्मिक अनुष्ठान; बैराग = वैराग्य; खोजी = खोजने वाला; तुरतहिं = तुरंत; तलास = तलाश; स्वाँसों की स्वाँस = हर सांस में।
भावार्थ: इस सबद में स्वयं परमात्मा बोल रहे हैं। वे कहते हैं — "हे मनुष्य! तू मुझे कहाँ खोजता है? मैं तो तेरे पास ही हूँ — तेरे भीतर।" परमात्मा स्पष्ट करते हैं कि वे न मंदिर में हैं, न मस्जिद में, न मक्का में, न कैलाश में। वे न बाहरी कर्मकांड में मिलते हैं, न योग या वैराग्य में। जो सच्चे मन से खोजे, उसे वे तुरंत मिल जाते हैं। कबीर का निष्कर्ष: परमात्मा हर प्राणी की हर सांस में विद्यमान हैं। यह सबद निर्गुण भक्ति-दर्शन का सार है।
पद:
संतों, देखत जग बौराना।
साँच कहौं तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।।
नेमी देखा धरमी देखा, प्रात करै असनाना।
आतम मारि पखान पूजे, उनमें कछु नहिं ज्ञाना।।
बहुतक देखे पीर औलिया, पढ़ैं किताब कुराना।
कै मुर्दा कै जिंदा पूजें, उनमें उहै दिवाना।।
कहत कबीर सुनो भई साधो, इनमें कौन सयाना।।
शब्दार्थ: बौराना = पागल हो जाना; साँच = सच; मारन धावै = मारने दौड़ते हैं; पतियाना = विश्वास करना; नेमी = नियम पालने वाला; असनाना = स्नान; आतम मारि = आत्मा को मारकर/दबाकर; पखान = पत्थर; पीर औलिया = इस्लाम के संत; उहै = वही; दिवाना = पागल; सयाना = बुद्धिमान।
भावार्थ: इस सबद में कबीर समाज की मूर्खता और धार्मिक पाखंड पर कड़ा व्यंग्य करते हैं। वे कहते हैं — हे संतो! यह जग पागल हो गया है। जब सच बोलो तो लोग मारने दौड़ते हैं, झूठ पर विश्वास कर लेते हैं। हिंदू पत्थर की मूर्ति पूजता है (आत्मज्ञान छोड़कर); मुसलमान मृत पीर-औलियाओं को पूजता है — दोनों में ज्ञान नहीं है। कबीर पूछते हैं: इनमें कौन बुद्धिमान है? उनका उत्तर है: कोई नहीं — क्योंकि सभी बाहरी आडंबर में उलझे हैं।
4. मुख्य विषय (Themes)
(क) निर्गुण ईश्वर का दर्शन: कबीर के ईश्वर का कोई रूप, रंग, आकार नहीं है। वे सर्वव्यापी हैं और हर हृदय में विद्यमान हैं। मंदिर-मस्जिद से वे नहीं मिलते — केवल शुद्ध हृदय और सच्चे प्रेम से मिलते हैं।
(ख) भक्ति और प्रेम: कबीर के लिए प्रेम ही सबसे बड़ी भक्ति है। "प्रेम गली अति साँकरी" — अहंकार छोड़े बिना ईश्वर नहीं मिलते। "ढाई आखर प्रेम का" ज्ञान का सार है।
(ग) सामाजिक समानता: कबीर ने जाति-भेद, ऊँच-नीच, हिंदू-मुसलमान के भेद को सीधे चुनौती दी। उन्होंने ब्राह्मणवाद और मुल्लावाद दोनों की आलोचना की।
(घ) माया-त्याग: "पाँणी केरा बुदबुदा" — जीवन क्षणभंगुर है। संसार की माया में लिप्त रहना मूर्खता है। मृत्यु अवश्यंभावी है, अतः ईश्वर-चिंतन ही सार्थक है।
(ङ) गुरु-महिमा: कबीर ने गुरु को परमात्मा से भी ऊँचा स्थान दिया। गुरु ज्ञान का दीपक जलाता है और अज्ञान का अंधकार दूर करता है।
(च) अहंकार-त्याग: "जब मैं था तब हरि नहीं" — अहंकार ईश्वर-प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है। अहंकार छोड़ने पर ही ईश्वर मिलते हैं।
(छ) आडंबर-विरोध: "संतों, देखत जग बौराना" — मूर्तिपूजा, तीर्थ-यात्रा, नमाज़, कर्मकांड सभी बाहरी दिखावे हैं। ईश्वर तो भीतर है।
5. भाषा — सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी)
कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी कहा जाता है। इसमें अनेक भाषाओं के शब्दों का मिश्रण है:
- हिंदी / ब्रज: हरि, मानुस, राम, घट, देखत, जग
- अवधी: मोको, बंदे, तुरतहिं, जिनि
- राजस्थानी: पाँणी, आपणे, बुदबुदा, दिउँड़ी
- पंजाबी: गुर, बलिहारी, साँकरी, नियरे
- अरबी-फ़ारसी: काबे, मस्जिद, बंदे, तलास, पीर, औलिया, कुराना
- संस्कृत: मानसरोवर, कस्तूरी, मृग, योग, धर्म, क्षमा
विशेषताएँ:
- भाषा सरल, बोधगम्य और सीधी — पंडितों की क्लिष्ट संस्कृत नहीं।
- लोक-जीवन से लिए गए उदाहरण और उपमाएँ।
- व्याकरण की दृष्टि से अनियमित, किंतु भावाभिव्यक्ति में अत्यंत प्रभावशाली।
- साखी में दोहा-छंद (13+11 = 24 मात्राएँ)।
- सबद में संगीतात्मकता — राग में गाया जाता था।
6. काव्य सौंदर्य — अलंकार, रस और बिंब
प्रमुख अलंकार:
- रूपक: "प्रेम गली" — प्रेम को गली का रूप। "मानसरोवर" — परमात्मा के भक्ति-सागर को मानसरोवर का रूप।
- उपमा: "पाँणी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात" — मनुष्य की तुलना पानी के बुलबुले से ('अस' उपमावाचक)। "ज्यों तारा परभात" — मृत्यु की तुलना सुबह छिपते तारे से।
- प्रतीक (Symbol): हंस = जीवात्मा; मानसरोवर = परमात्मा; कस्तूरी-मृग = अज्ञानी मनुष्य; हाथी = ज्ञान और धैर्य; कुत्ता (स्वान) = सांसारिक आलोचना; पोथी = शुष्क पुस्तकीय ज्ञान।
- अनुप्रास: "सब स्वाँसों की स्वाँस में" — 'स' वर्ण की आवृत्ति। "बिन पानी साबुन बिना" — 'ब' की पुनरावृत्ति।
- विरोधाभास (Paradox / विरोधमूलक अलंकार): "जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं" — दो विरोधी सत्य एक साथ, जो गहरा दार्शनिक सत्य प्रकट करते हैं।
- दृष्टांत अलंकार: कस्तूरी-मृग और मनुष्य की समानांतर स्थिति दृष्टांत का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- व्याजस्तुति (व्यंग्यात्मक प्रशंसा): "पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ" — पुस्तकी विद्वानों पर सटीक व्यंग्य।
रस:
- शांत रस — प्रधान रस। वैराग्य, ज्ञान और परमशांति का वातावरण।
- भक्ति रस (शांत रस का भेद) — ईश्वर-प्रेम और समर्पण का भाव।
- करुण रस — जीवन की क्षणभंगुरता पर विचार करते हुए।
- हास्य / व्यंग्य: "जग बौराना" और "पोथी पढ़ि जग मुआ" में हल्का व्यंग्यात्मक स्वर।
छंद: साखियाँ दोहा छंद में (13+11 मात्रा)। सबद में मात्रिक गेयता।
सजीव बिंब (Imagery): मानसरोवर में तैरता हंस, पानी का बुलबुला, प्रभात में छिपते तारे, कस्तूरी खोजता हिरन, निंदक और साबुन — ये सभी अत्यंत सजीव और मार्मिक बिंब हैं जो कबीर की कविता को अविस्मरणीय बनाते हैं।
7. महत्त्वपूर्ण शब्दार्थ (15-20 शब्द)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| साखी | साक्षी (गवाह) — दोहा रूप में अनुभव-उपदेश |
| सबद | शब्द — संगीतात्मक गेय पद |
| मोको | मुझे (अवधी) |
| बंदे | हे इंसान (अरबी-फ़ारसी से) |
| देवल | मंदिर |
| काबे | मक्का का काबा — इस्लाम का पवित्र तीर्थ |
| बुदबुदा | पानी का बुलबुला |
| परभात | प्रभात, सुबह |
| साँकरी | संकरी, तंग |
| बलिहारी | न्योछावर होना, कुर्बान होना |
| निंदक | आलोचना करने वाला व्यक्ति |
| नियरे | पास में, निकट |
| कस्तूरी | हिरन की नाभि में पाई जाने वाली सुगंधित वस्तु |
| घट घट | हर शरीर में, हर प्राणी में |
| बौराना | पागल हो जाना |
| पोथी | मोटा ग्रंथ / पुस्तक |
| आखर | अक्षर |
| तुरतहिं | तुरंत, फ़ौरन |
| बैराग | वैराग्य — सांसारिक मोह से विरक्ति |
| पखान | पत्थर (यहाँ मूर्ति के अर्थ में) |
8. NCERT प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. मानसरोवर से कवि का क्या आशय है?
उत्तर: मानसरोवर से कवि का आशय उस पवित्र और ज्ञान-भक्ति से भरे मन से है जो परमात्मा का निवास स्थान है। जैसे मानसरोवर झील अत्यंत पवित्र और निर्मल होती है, वैसे ही शुद्ध हृदय में परमात्मा का वास होता है। हंस (जीवात्मा) उस परमात्मा-रूपी मानसरोवर में भक्ति के मोती (मुक्ताफल) चुगती है और आनंद-मग्न रहती है। एक बार उस परमात्मा-प्रेम में रमने के बाद वह सांसारिक मोह-माया में नहीं लौटती।
प्रश्न 2. कवि ने सच्चे प्रेमी की क्या कसौटी बताई है?
उत्तर: कबीर के अनुसार सच्चा प्रेमी वह है जो ईश्वर के प्रेम में पूरी तरह लीन हो और जिसका अहंकार पूरी तरह मिट गया हो। प्रेम की गली बहुत संकरी है — उसमें "मैं" (अहंकार) और ईश्वर दोनों एक साथ नहीं समा सकते। सच्चा प्रेमी सांसारिक निंदा-स्तुति की परवाह नहीं करता और केवल ईश्वर-प्रेम में तल्लीन रहता है।
प्रश्न 3. तीसरी साखी (निंदक वाली) में कवि ने क्या सीख दी है?
उत्तर: कबीर ने निंदक को अपने पास रखने की सलाह दी है। निंदक (आलोचना करने वाला) हमारी कमियों को उजागर करके बिना साबुन-पानी के हमारे स्वभाव को निर्मल करता है। इस प्रकार वह हमारा सबसे बड़ा हितैषी है। यह साखी सहिष्णुता, आत्म-निरीक्षण और विनम्रता की अद्भुत सीख देती है।
प्रश्न 4. इस पाठ में कवि ने सांसारिक जीवन की नश्वरता पर किस प्रकार प्रकाश डाला है?
उत्तर: "पाँणी केरा बुदबुदा" दोहे में कबीर ने मनुष्य जीवन की तुलना पानी के बुलबुले से की है। साथ ही "ज्यों तारा परभात" उपमा से वे बताते हैं कि जैसे सुबह होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही मृत्यु आने पर यह जीवन समाप्त हो जाता है। इसलिए माया-मोह छोड़कर ईश्वर-भक्ति में लगना चाहिए।
प्रश्न 5. सबद "मोको कहाँ ढूँढ़े" में ईश्वर की सर्वव्यापकता का वर्णन किस प्रकार हुआ है?
उत्तर: इस सबद में ईश्वर स्वयं कहते हैं कि वे न मंदिर में हैं, न मस्जिद में, न काबे में, न कैलाश में, न बाहरी पूजा-पाठ में, न योग-वैराग्य में। वे तो हर प्राणी की हर सांस में विद्यमान हैं। सच्चे मन से खोजने वाले को वे पल भर में मिल जाते हैं। यह ईश्वर की पूर्ण सर्वव्यापकता और निर्गुण स्वरूप का अद्भुत वर्णन है।
- सखी
- साक्षी
- शाखा
- सत्य
- गुरु का
- ईश्वर का
- उस मनुष्य का जो ईश्वर को बाहर खोजता है
- कबीर का
- कबीर का शरीर
- अहंकार
- आत्मा
- गुरु
- ब्रजभाषा
- अवधी
- सधुक्कड़ी
- खड़ी बोली
- कबीर
- गुरु रामानंद
- स्वयं परमात्मा
- शिष्य
- रूपक
- उपमा
- अनुप्रास
- यमक
- रामचरितमानस
- बीजक
- गीतावली
- पदमावत
- ईश्वर की
- माता-पिता की
- गुरु की
- समाज की
- सगुण भक्ति — कृष्ण-भक्ति शाखा
- सगुण भक्ति — राम-भक्ति शाखा
- निर्गुण भक्ति — ज्ञानमार्गी शाखा
- निर्गुण भक्ति — प्रेममार्गी शाखा
- प्रेम बहुत कठिन है
- अहंकार और ईश्वर एक साथ नहीं रह सकते
- दो व्यक्ति एक साथ प्रेम नहीं कर सकते
- ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता लंबा है
- मन को
- जीवन को
- परमात्मा को
- गुरु को
- कुरान
- ब्राह्मणों के मोटे-मोटे शुष्क ग्रंथ
- रामायण
- बीजक
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