ल्हासा की ओर

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CLASS IX Hindi ~5 अंक Ch 2 of 16
ल्हासा की ओर

Class 9 · Hindi · NCERT chapter notes · Akanksha Classes

एक नज़र में
  • विधा: यात्रा-वृत्तांत (Travelogue) — लेखक की तिब्बत-यात्रा का प्रत्यक्ष, जीवंत वर्णन।
  • लेखक: राहुल सांकृत्यायन — हिंदी के महान यात्री, विद्वान और 'महापंडित'।
  • यात्रा: नेपाल-तिब्बत मार्ग से ल्हासा तक की दुर्गम पैदल यात्रा, भिखमंगे/भिक्षु के भेस में।
  • साथी: तिब्बती भिक्षु सुमति — मार्गदर्शक और परिचय-संपन्न साथी।
  • मुख्य संदेश: साहस, जिज्ञासा, मानवीय एकता और भारत-तिब्बत के सांस्कृतिक संबंध।
  • परीक्षा में महत्त्व: ~5 अंक — गद्यांश, लघु-उत्तर एवं दीर्घ-उत्तर प्रश्न।
विस्तृत नोट्स

1. लेखक परिचय — राहुल सांकृत्यायन

जन्म: 9 अप्रैल 1893, पंदहा गाँव, आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) | निधन: 14 अप्रैल 1963।

राहुल सांकृत्यायन का मूल नाम केदारनाथ पाण्डेय था। बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने पर उन्होंने 'राहुल' नाम धारण किया और 'सांकृत्यायन' गोत्र अपनाया। उन्हें 'महापंडित' तथा 'घुमक्कड़-शास्त्र के पितामह' कहा जाता है।

  • अपने जीवन में उन्होंने 45 से अधिक भाषाएँ सीखीं और चार बार तिब्बत की यात्रा की।
  • तिब्बत से वे बहुमूल्य बौद्ध पांडुलिपियाँ भारत लेकर आए।
  • प्रमुख कृतियाँ: घुमक्कड़शास्त्र, मेरी तिब्बत यात्रा, दिमागी गुलामी, वोल्गा से गंगा, किन्नर देश में।
  • वे इतिहासकार, दार्शनिक, कथाकार, भाषाविद् और यात्री — सब एक साथ थे।

प्रस्तुत पाठ उनकी पुस्तक 'किन्नर देश में' से लिया गया है, जो सन् 1929-30 के दशक में की गई तिब्बत-यात्रा का जीवंत विवरण प्रस्तुत करता है।

2. यात्रा का विस्तृत सारांश

2.1 यात्रा की पृष्ठभूमि और भेस

उस समय तिब्बत में विदेशियों और भारतीयों का प्रवेश पूर्णतः वर्जित था। अंग्रेज़ी सरकार भी अपने अधीन भारतीयों को तिब्बत जाने की अनुमति नहीं देती थी। ऐसे में राहुल सांकृत्यायन ने नेपाली बौद्ध भिखमंगे (भिक्षु) का भेस धारण किया। वे तिब्बती भाषा जानते थे और बौद्ध धर्म के गहरे जानकार थे, इसलिए किसी को संदेह नहीं हुआ। उनके पास न पासपोर्ट था, न वीज़ा — केवल साहस और जिज्ञासा थी।

उनके साथ सुमति नामक तिब्बती भिक्षु-साथी था जो रास्ते में मार्गदर्शन करता था, खच्चरों का इंतज़ाम करता था और स्थानीय लोगों से संवाद में सहायता करता था।

2.2 नेपाल से तिब्बत में प्रवेश

लेखक नेपाल होकर तिब्बत में प्रवेश करते हैं। नेपाल और तिब्बत के बीच का रास्ता उस समय एक सैनिक-व्यापारिक मार्ग था जहाँ जगह-जगह चौकियाँ थीं। भिखमंगे के भेस में उन्हें किसी विशेष पूछताछ का सामना नहीं करना पड़ा और वे सरलता से आगे बढ़ते गए।

2.3 डाँड़ा थोङ्ला — सबसे खतरनाक भाग

यात्रा का सबसे कठिन और भयावह भाग था डाँड़ा थोङ्ला को पार करना। यह तिब्बत का एक अत्यंत ऊँचा, निर्जन पर्वतीय दर्रा है — लगभग सोलह-सत्रह हजार फीट की ऊँचाई पर। यहाँ दूर-दूर तक न कोई गाँव था, न आबादी। इस सुनसान क्षेत्र में डाकुओं (खंपाओं) का अत्यधिक भय था। लेखक बताते हैं:

  • यहाँ खून होने पर भी कोई पूछने वाला नहीं था, क्योंकि गाँव कोसों दूर थे।
  • हथियार रखने पर कोई कानूनी रोक न होने से डाकू बंदूकें खुलेआम रखते थे।
  • डाकू पहले आदमी को मार डालते थे ताकि बाद में कोई गवाही देने वाला न बचे।
  • ऐसे में लेखक का भिखारी का भेस ही रक्षा-कवच बना — भिखारी के पास लूटने को कुछ नहीं, अतः डाकू उसे छोड़ देते थे।

2.4 रास्ते की अन्य कठिनाइयाँ

  • भ्रामक रास्ते: एक बार लेखक गलत रास्ते पर निकल गए और लगभग दो मील आगे चले गए। वापस लौटकर सही रास्ता लेना पड़ा।
  • सुस्त घोड़ा: दूसरी बार डाँड़ा पार करते समय लेखक का घोड़ा अत्यंत सुस्त था, जिससे वे काफिले से बहुत पीछे रह गए।
  • कड़ाके की ठंड: ऊँचाई पर तीव्र शीत और कम ऑक्सीजन यात्रा को और अधिक कष्टकर बनाती थी।
  • भोजन-पानी की कमी: रास्ते में नियमित भोजन नहीं मिलता था। यात्री सत्तू (भुने जौ के आटे), मक्खन-चाय (पो-चा) और छाँग पर निर्भर रहते थे।

2.5 सुमति का स्वभाव और उनकी भूमिका

साथी सुमति बहुत मिलनसार स्वभाव के थे। उनके उस क्षेत्र में अनेक परिचित और यजमान थे। सुमति को रास्ते भर अपने यजमानों से "कुची-कुची" (दया-धर्म/दान) माँगने और उनसे मिलने का बड़ा चाव था। एक बार जब वे यजमानों के यहाँ रुकना चाहते थे, तब लेखक ने चतुराई से कह दिया कि वे आगे निकल जाएँगे — इस युक्ति से सुमति समय पर साथ आ गए। सुमति की जान-पहचान के कारण लेखक को रास्ते में ठहरने और भोजन की सुविधा सहज ही मिल जाती थी।

2.6 तिब्बत में रहने-खाने की व्यवस्था

तिब्बत में आधुनिक सराय या धर्मशाला की परंपरा नहीं थी। वहाँ की आतिथ्य-परंपरा के अनुसार यात्री किसी भी घर में जाकर रात बिता सकते थे — घर वाले मना नहीं करते थे। भिक्षु और तीर्थयात्री को विशेष आदर और सहायता मिलती थी। भोजन में मुख्यतः पो-चा (नमकीन मक्खन-चाय), सत्तू, छाँग (जौ से बनी तिब्बती शराब) और जौ की रोटी मिलती थी।

2.7 बौद्ध मठ में पांडुलिपियाँ

यात्रा के दौरान लेखक एक बड़े बौद्ध मठ में रुकते हैं। यहाँ उन्हें अत्यंत दुर्लभ हस्तलिखित और छपी हुई बौद्ध पांडुलिपियाँ — जिनमें 'कन्जुर' जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ थे — मिलती हैं। यही लेखक का मूल उद्देश्य था। ये पांडुलिपियाँ भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का अमूल्य हिस्सा थीं जो कभी बौद्ध विद्वानों ने तिब्बत ले जाई थीं।

2.8 तिङ्री और ल्हासा की ओर अंतिम चरण

डाँड़ा थोङ्ला पार करने के बाद यात्री तिङ्री के विशाल मैदान की ओर बढ़ते हैं। यहाँ से दृश्य अपेक्षाकृत खुला और हरा-भरा हो जाता है। इसके बाद लेखक धीरे-धीरे तिब्बत की राजधानी ल्हासा की ओर बढ़ते हैं। इस पूरी यात्रा में उनका मनोबल ऊँचा बना रहता है क्योंकि उनका लक्ष्य — बौद्ध साहित्य की खोज और भारत-तिब्बत संबंधों को समझना — उनके लिए सर्वोपरि था।

3. तिब्बत की सामाजिक व्यवस्था

लेखक ने तिब्बती समाज का सूक्ष्म अवलोकन किया है और उसकी विशेषताएँ इस प्रकार बताई हैं:

  • जाति-भेद का अभाव: तिब्बत में भारत जैसी कठोर जाति-व्यवस्था और छुआछूत नहीं थी। कोई भी किसी के घर खाना खा सकता था।
  • महिलाओं की स्थिति: तिब्बती महिलाएँ परदा नहीं करती थीं। वे व्यापार, कृषि और सार्वजनिक जीवन में पुरुषों के साथ सक्रिय भागीदारी निभाती थीं।
  • आतिथ्य-परंपरा: अजनबी यात्रियों को घर में रुकने देना और खाना खिलाना यहाँ की सहज परंपरा थी।
  • बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव: मठ, लामा और बौद्ध अनुष्ठान तिब्बती जीवन के केंद्र में थे। भिक्षुओं को अत्यंत सम्मान दिया जाता था।
  • व्यापार और पशुपालन: लोग मुख्यतः याक, खच्चर और घोड़ों के माध्यम से व्यापार करते थे।
  • डाकुओं की समस्या: चीनी सेना के हटने के बाद कानून-व्यवस्था कमज़ोर हो गई थी, जिससे डाकुओं का आतंक था।
  • भाषाई विविधता: तिब्बती भाषा पर संस्कृत का प्रभाव था, जो भारत-तिब्बत के ऐतिहासिक संबंधों का प्रमाण है।

4. मुख्य विषय और संदेश

4.1 साहसिक यात्रा का उत्साह

पाठ का केंद्रीय भाव साहस और जिज्ञासा है। लेखक जान की परवाह किए बिना एक वर्जित देश में प्रवेश करते हैं — केवल ज्ञान और अन्वेषण की लालसा से। हर कठिनाई को वे उत्साह से स्वीकारते हैं।

4.2 भारत-तिब्बत के सांस्कृतिक संबंध

लेखक बताते हैं कि तिब्बत और भारत के बीच प्राचीन काल से गहरे सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। बौद्ध धर्म भारत से तिब्बत गया। तिब्बती भाषा और साहित्य पर संस्कृत का प्रभाव है। वहाँ की बौद्ध पांडुलिपियाँ वास्तव में भारत की ही धरोहर हैं।

4.3 घुमक्कड़ी का महत्त्व

लेखक का दृढ़ मत था कि यात्रा सबसे बड़ा शिक्षक है। किताबों से जो नहीं मिलता, वह अनुभव से मिलता है। घुमक्कड़ी से जीवन में नई दृष्टि, व्यापक समझ और नई ऊर्जा आती है।

4.4 मानवीय एकता

रास्ते में भिन्न भाषा और संस्कृति के लोगों ने लेखक की सहायता की। यह पाठ यह संदेश देता है कि मानवीय करुणा और सहायता की भावना सरहदों और भाषाओं से परे होती है।

5. भाषा और शैली

  • भाषा: सरल, स्वाभाविक और प्रवाहमयी हिंदी। तिब्बती शब्दों — पो-चा, छाँग, कुची-कुची, थोङ्ला, खंपा — का सहज एवं सार्थक प्रयोग।
  • शैली: वर्णनात्मक और विवरणात्मक। लेखक घटनाओं को ऐसे जीवंत ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि पाठक स्वयं यात्री के साथ चलता हुआ अनुभव करता है।
  • हास्य-व्यंग्य: सुमति के "कुची-कुची" माँगने की आदत और लेखक की युक्ति जैसे प्रसंगों में हल्की विनोद-वृत्ति देखी जाती है।
  • चित्रात्मकता: प्राकृतिक दृश्यों का इतना सजीव वर्णन है कि तिब्बत के बर्फीले पहाड़ और सुनसान मैदान मानो आँखों के सामने उभर आते हैं।
  • उद्देश्य: मात्र भौगोलिक विवरण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और मानवीय पहलुओं पर प्रकाश डालना।

6. महत्त्वपूर्ण अंश एवं उनकी व्याख्या

अंश 1 — भेस का कारण

"भिखमंगे के वेश में यात्रा करना ही एकमात्र उपाय था, क्योंकि विदेशी को तिब्बत में घुसने की अनुमति नहीं थी।"

व्याख्या: यह पंक्ति लेखक की बुद्धिमत्ता और साहस दोनों प्रकट करती है। जहाँ नियम और व्यवस्था बाधा बन जाए, वहाँ लेखक नई युक्ति अपनाते हैं। यह उनकी ज्ञान के प्रति अदम्य लगन का प्रमाण है।

अंश 2 — डाकुओं का भय

"तिब्बत में यात्री की सुरक्षा का कोई भरोसा नहीं था। यहाँ खून हो जाने पर भी कोई पूछने वाला नहीं होता।"

व्याख्या: इस कथन से तिब्बत की तत्कालीन कानून-व्यवस्था का पता चलता है। लेखक इस खतरे से भलीभाँति परिचित हैं, फिर भी यात्रा जारी रखते हैं — यह उनके असाधारण साहस का परिचायक है।

अंश 3 — तिब्बती समाज का भेदभाव-मुक्त स्वरूप

"तिब्बत में जाति-पाँति का भेद नहीं था। हर कोई हर किसी के घर खाना खा सकता था।"

व्याख्या: भारत की जाति-व्यवस्था से परिचित लेखक को तिब्बत की समतावादी सामाजिक व्यवस्था एक सुखद और प्रेरक अनुभव देती है।

अंश 4 — घुमक्कड़ी की महत्ता

"घुमक्कड़ी में जो आनंद और ज्ञान है, वह और कहीं नहीं।"

व्याख्या: लेखक घुमक्कड़ी को जीवन का सर्वोच्च आनंद और ज्ञान का श्रेष्ठ स्रोत मानते हैं। यह उनके पूरे जीवन-दर्शन का सार है।

7. कठिन शब्द और अर्थ

शब्द अर्थ
यात्रा-वृत्तांतयात्रा का विस्तृत विवरण / Travelogue
डाँड़ा थोङ्लातिब्बत में ऊँचा, निर्जन पर्वतीय दर्रा (mountain pass)
पो-चातिब्बती नमकीन मक्खन-चाय
छाँगजौ से बनाया जाने वाला तिब्बती मादक पेय
सत्तूभुने हुए जौ या चने का आटा
कुची-कुचीदया-धर्म / दान माँगना (तिब्बती प्रथा)
खंपातिब्बती डाकू
खच्चरघोड़े और गधे के मेल से उत्पन्न पशु / mule
याकतिब्बत का विशेष बड़ा पहाड़ी बैल
कन्जुरतिब्बती बौद्ध धर्मग्रंथों का विशाल संकलन
पांडुलिपिहाथ से लिखी पुरानी पुस्तक / manuscript
लामातिब्बती बौद्ध धर्म का पुजारी / गुरु
दुर्गमजहाँ पहुँचना बहुत कठिन हो / inaccessible
भेस / वेशकिसी और का रूप / disguise
आतिथ्यअतिथि का स्वागत-सत्कार / hospitality
घुमक्कड़जो हमेशा घूमता रहे / wanderer
यजमानआश्रय देने वाला / host; वह परिवार जो नियमित दान देता हो
तिङ्रीतिब्बत में स्थित एक मैदानी क्षेत्र

8. NCERT पाठ-बोध प्रश्नोत्तर

प्र. 1 — थोंगला के पहले के आखिरी गाँव पहुँचने पर लेखक को किसका इंतज़ार था?

उत्तर: थोंगला दर्रे से पहले के आखिरी गाँव में लेखक को अपने साथी सुमति का इंतज़ार था, जो खच्चरों और रसद का इंतज़ाम करने गए थे। लेखक वहाँ रुककर उनकी प्रतीक्षा करते रहे।

प्र. 2 — बौद्ध मठ में लेखक को क्या मिला और वे इतने उत्साहित क्यों थे?

उत्तर: बौद्ध मठ में लेखक को अत्यंत दुर्लभ हस्तलिखित और छपी हुई बौद्ध पांडुलिपियाँ — जिनमें 'कन्जुर' जैसे ग्रंथ थे — मिलीं। लेखक इसलिए उत्साहित थे क्योंकि यही उनकी यात्रा का मूल उद्देश्य था। ये पांडुलिपियाँ भारतीय बौद्ध ज्ञान-परंपरा की अमूल्य धरोहर थीं।

प्र. 3 — लेखक को तिब्बत में भिखारी के भेस में क्यों यात्रा करनी पड़ी?

उत्तर: उस समय तिब्बत में भारतीयों और विदेशियों का प्रवेश वर्जित था और अंग्रेज़ी सरकार भी अनुमति नहीं देती थी। यदि लेखक अपनी असली पहचान से जाते तो पकड़े जाते। इसलिए उन्होंने नेपाली बौद्ध भिखमंगे का वेश धारण किया। तिब्बती भाषा के ज्ञान और बौद्ध धर्म की गहरी जानकारी ने उनका भेस और पुख्ता कर दिया। इसके अतिरिक्त यह वेश डाकुओं से भी बचाता था।

प्र. 4 — तिब्बत में यात्रियों के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या था?

उत्तर: तिब्बत में यात्रियों के लिए सबसे बड़ा खतरा डाकुओं (खंपाओं) का था। वे न केवल सामान लूटते थे बल्कि पहले आदमी को मार देते थे ताकि कोई गवाह न बचे। निर्जन क्षेत्रों में खून होने पर भी कोई पूछने वाला नहीं था।

प्र. 5 — तिब्बत की सामाजिक व्यवस्था भारत से किस प्रकार भिन्न थी?

उत्तर: तिब्बत में जाति-भेद और छुआछूत नहीं था जबकि उस समय भारत में यह कठोर रूप से प्रचलित थी। तिब्बत में महिलाएँ परदा नहीं करती थीं और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय थीं। अजनबी यात्री किसी के भी घर रुक सकते थे और खाना खा सकते थे। भिक्षुओं को अत्यंत आदर मिलता था।

प्र. 6 — 'ल्हासा की ओर' पाठ का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: इस पाठ का मुख्य संदेश है — साहस, जिज्ञासा और ज्ञान की लालसा से हर बाधा पार की जा सकती है। यात्रा से हमें संस्कृतियों को समझने का अवसर मिलता है। भारत-तिब्बत के प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों को उजागर करना भी इस पाठ का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।

9. सामान्य भूलें और सुधार

  • डाँड़ा थोङ्ला कोई नगर या गाँव नहीं है — यह एक ऊँचा, निर्जन पर्वतीय दर्रा है।
  • कुची-कुची कोई स्थान नहीं — इसका अर्थ है दया-धर्म / दान माँगना
  • लेखक का उद्देश्य केवल घूमना नहीं, बल्कि बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन और संरक्षण भी था।
  • यह पाठ यात्रा-वृत्तांत विधा में है — न कहानी, न उपन्यास।
  • लेखक का साथी सुमति था — दलाई लामा नहीं।
  • पाठ किन्नर देश में पुस्तक से है — घुमक्कड़शास्त्र से नहीं।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
1. 'ल्हासा की ओर' पाठ के लेखक कौन हैं?
  1. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
  2. राहुल सांकृत्यायन
  3. महादेवी वर्मा
  4. रामधारी सिंह दिनकर
उत्तर: (B) राहुल सांकृत्यायन — हिंदी के प्रसिद्ध यात्री-लेखक और महापंडित।
2. राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत यात्रा के लिए कौन सा भेस धारण किया था?
  1. तिब्बती व्यापारी का
  2. चीनी सैनिक का
  3. नेपाली बौद्ध भिखमंगे का
  4. भारतीय पुजारी का
उत्तर: (C) नेपाली बौद्ध भिखमंगे का — ताकि वे संदेह से मुक्त रहकर तिब्बत में यात्रा कर सकें।
3. लेखक के तिब्बती साथी का नाम क्या था?
  1. दलाई
  2. सुमति
  3. तेनज़िंग
  4. लोबसाँग
उत्तर: (B) सुमति — जो लेखक का मार्गदर्शन करते थे और खच्चरों का प्रबंध करते थे।
4. 'ल्हासा की ओर' पाठ किस विधा में लिखा गया है?
  1. कहानी
  2. कविता
  3. यात्रा-वृत्तांत
  4. नाटक
उत्तर: (C) यात्रा-वृत्तांत — लेखक ने तिब्बत-यात्रा का जीवंत विवरण प्रस्तुत किया है।
5. तिब्बत में यात्रियों के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या था?
  1. तेज़ ठंड
  2. भूख
  3. डाकुओं का भय
  4. जंगली जानवर
उत्तर: (C) डाकुओं का भय — चीनी सेना के जाने के बाद कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं बची थी।
6. तिब्बत की नमकीन मक्खन-चाय को क्या कहते हैं?
  1. छाँग
  2. पो-चा
  3. सत्तू
  4. कुची-कुची
उत्तर: (B) पो-चा — तिब्बत की पारंपरिक नमकीन-मक्खन चाय जो वहाँ का मुख्य पेय है।
7. बौद्ध मठ में लेखक को क्या मिला?
  1. सोने-चाँदी के सिक्के
  2. दुर्लभ बौद्ध पांडुलिपियाँ
  3. तिब्बती हथियार
  4. चीनी व्यापारी
उत्तर: (B) दुर्लभ बौद्ध पांडुलिपियाँ — जो भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का अमूल्य हिस्सा थीं।
8. तिब्बत में जाति-व्यवस्था के बारे में लेखक ने क्या बताया?
  1. वहाँ जाति-भेद बहुत कठोर था
  2. वहाँ जाति-भेद और छुआछूत बिल्कुल नहीं था
  3. वहाँ केवल दो जातियाँ थीं
  4. वहाँ धर्म के आधार पर भेद था
उत्तर: (B) वहाँ जाति-भेद और छुआछूत बिल्कुल नहीं था — यह तिब्बती समाज की विशेष और प्रशंसनीय विशेषता थी।
9. राहुल सांकृत्यायन का मूल नाम क्या था?
  1. रामप्रसाद पाण्डेय
  2. केदारनाथ पाण्डेय
  3. शिवप्रसाद सिंह
  4. लक्ष्मीनारायण मिश्र
उत्तर: (B) केदारनाथ पाण्डेय — बौद्ध दीक्षा के बाद उन्होंने 'राहुल सांकृत्यायन' नाम धारण किया।
10. 'घुमक्कड़शास्त्र' किसकी रचना है?
  1. प्रेमचंद
  2. जयशंकर प्रसाद
  3. राहुल सांकृत्यायन
  4. रामवृक्ष बेनीपुरी
उत्तर: (C) राहुल सांकृत्यायन — जिसमें उन्होंने यात्रा को जीवन का सर्वोच्च मूल्य और ज्ञान का श्रेष्ठ साधन बताया है।
11. 'ल्हासा की ओर' पाठ किस पुस्तक से लिया गया है?
  1. वोल्गा से गंगा
  2. दिमागी गुलामी
  3. किन्नर देश में
  4. एशिया के दुर्गम भूखंड
उत्तर: (C) किन्नर देश में — राहुल सांकृत्यायन की तिब्बत-यात्रा पर आधारित पुस्तक।
12. 'कुची-कुची' का तिब्बती अर्थ क्या है?
  1. एक पर्वत का नाम
  2. दया-धर्म / दान माँगना
  3. एक प्रकार की चाय
  4. डाकू
उत्तर: (B) दया-धर्म / दान माँगना — सुमति अपने यजमानों से यही माँगते थे।
पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQ)
PYQ 1. लेखक ने तिब्बत में किस भेस में यात्रा की और यह भेस उनके लिए किस प्रकार उपयोगी रहा? (CBSE, 3 अंक)
उत्तर: लेखक ने नेपाली बौद्ध भिखमंगे (भिक्षु) का भेस धारण करके तिब्बत की यात्रा की क्योंकि वहाँ विदेशियों का प्रवेश वर्जित था। यह भेस कई प्रकार से उपयोगी रहा — (1) सैनिक चौकियों पर पूछताछ से बचाया; (2) निर्जन डाँड़े पर डाकुओं से सुरक्षा मिली, क्योंकि भिखारी के पास लूटने को कुछ नहीं होता; (3) भिक्षु होने के कारण तिब्बती घरों में आदर और भोजन-आश्रय सहज मिला।
PYQ 2. तिब्बत में यात्रा के दौरान लेखक को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा? (CBSE, 3 अंक)
उत्तर: लेखक को निम्नलिखित कठिनाइयाँ हुईं — (1) डाकुओं का भय — जो यात्रियों को लूट और मार देते थे; (2) सोलह-सत्रह हजार फीट ऊँचे डाँड़ा थोङ्ला को पार करना; (3) कड़ाके की ठंड; (4) रास्ता भटकना — एक बार लगभग दो मील अतिरिक्त चलना पड़ा; (5) सुस्त घोड़े के कारण काफिले से पीछे रह जाना; (6) भोजन-पानी की कमी
PYQ 3. राहुल सांकृत्यायन के यात्रा-वृत्तांत की भाषा और शैली की विशेषताएँ लिखिए। (CBSE, 2 अंक)
उत्तर: राहुल सांकृत्यायन की भाषा सरल, प्रवाहमयी और स्वाभाविक है। वे तिब्बती शब्दों (पो-चा, छाँग, कुची-कुची, थोङ्ला) का सहज प्रयोग करते हैं। शैली वर्णनात्मक और चित्रात्मक है। हास्य का हल्का पुट और संवाद-शैली पाठ को जीवंत बनाते हैं।
PYQ 4. तिब्बत में सामाजिक समानता के जो उदाहरण लेखक ने दिए हैं, उन्हें अपने शब्दों में लिखिए। (CBSE, 5 अंक)
उत्तर: लेखक ने तिब्बती समाज में सामाजिक समानता के ये उदाहरण दिए हैं — (1) जाति-भेद और छुआछूत का अभाव — कोई भी किसी के घर खाना खा सकता था; (2) महिलाओं की स्वतंत्रता — वे व्यापार और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय थीं, परदा नहीं करती थीं; (3) खुली आतिथ्य-परंपरा — अजनबी यात्री किसी भी घर में रात गुज़ार सकते थे; (4) भिक्षुओं का समान आदर — हर वर्ग के लोग भिक्षुओं का एक समान सम्मान करते थे। यह भारत की कठोर जाति-व्यवस्था से बिल्कुल भिन्न था।
PYQ 5. 'ल्हासा की ओर' पाठ के आधार पर राहुल सांकृत्यायन के व्यक्तित्व की विशेषताएँ बताइए। (CBSE, 3 अंक)
उत्तर: इस पाठ से उनके व्यक्तित्व की ये विशेषताएँ उभरती हैं — (1) साहसी और निडर — वर्जित देश में जान जोखिम में डालकर प्रवेश किया; (2) जिज्ञासु और ज्ञान-पिपासु — बौद्ध पांडुलिपियों की खोज उनका लक्ष्य था; (3) बुद्धिमान और व्यावहारिक — भेस बदलकर यात्रा करने की सटीक युक्ति सोची; (4) देशप्रेमी — भारतीय धरोहर पांडुलिपियों को वापस लाने का प्रयास किया; (5) धैर्यशील — कठिन परिस्थितियों में भी मनोबल ऊँचा बनाए रखा।
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