- कवयित्री: ललद्यद (लल्लेश्वरी / लल्ला) — 14वीं सदी की कश्मीरी संत-कवयित्री।
- विधा: वाख — कश्मीरी भाषा की चतुष्पादी (चार पंक्तियों की) लोक-काव्य विधा।
- भक्ति-धारा: निर्गुण भक्ति — ईश्वर को निराकार, सर्वव्यापी मानकर आत्मा के भीतर खोजना।
- केंद्रीय संदेश: सच्चा परमात्मा बाहरी अनुष्ठानों में नहीं, आत्म-शोध और शुद्ध आचरण में मिलता है।
- NCERT में: चार वाख संकलित हैं — प्रत्येक एक स्वतंत्र आध्यात्मिक संदेश देता है।
- बोर्ड वेटेज: ~5 अंक — सप्रसंग व्याख्या, भावार्थ, काव्य-सौंदर्य और प्रश्नोत्तर से प्रश्न आते हैं।
1. कवयित्री परिचय — ललद्यद
जन्म एवं काल: ललद्यद (जिन्हें लल्लेश्वरी, लल्ला, लल्लायोगेश्वरी, ललदेद और लाल दिद के नाम से भी जाना जाता है) का जन्म लगभग 14वीं शताब्दी (1320 ई.) में कश्मीर के पाम्पोर नामक गाँव में हुआ था। उनका निधन लगभग 1392 ई. में माना जाता है। वे कश्मीरी साहित्य की प्रथम और सर्वाधिक प्रसिद्ध कवयित्री हैं।
जीवन: बचपन से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति की ललद्यद का विवाह बहुत छोटी उम्र में हो गया। ससुराल में उन्हें बहुत कष्ट झेलने पड़े — सास का दुर्व्यवहार, भोजन में भेदभाव और उपेक्षा। परन्तु इन सभी कठिनाइयों के बीच उनका मन परमात्मा की खोज में लगा रहा। अंततः उन्होंने गृहस्थ जीवन त्यागकर शैव-तांत्रिक संत सिद्ध श्रीकण्ठ को अपना गुरु बनाया और साधना के मार्ग पर चल पड़ीं। वे घर-घर घूमकर, नाचती-गाती हुई अपने वाख सुनाती थीं और लोगों को ईश्वर-भक्ति का संदेश देती थीं।
रचनाएँ: ललद्यद ने कश्मीरी भाषा में वाख रचे। 'वाख' शब्द संस्कृत के 'वाक्' से बना है, जिसका अर्थ है — वाणी या वचन। इनकी रचनाओं का संकलन 'लल्ला-वाक्यानि' के नाम से प्रसिद्ध है। कुल 258 से अधिक वाख उपलब्ध हैं।
महत्त्व एवं प्रभाव: ललद्यद ने कश्मीरी लोक-संस्कृति पर गहरी छाप छोड़ी। वे हिंदू और मुस्लिम — दोनों समुदायों में समान रूप से आदरणीय हैं। हिंदुओं के लिए वे 'लल्लेश्वरी' और मुस्लिमों के लिए 'लाल आरिफा' हैं। कश्मीर में आज भी उनके वाख लोकगीतों की तरह गाए जाते हैं। वे भारतीय भक्ति-काव्य की महान परंपरा की अग्रदूत हैं।
भक्ति-दर्शन: ललद्यद कश्मीर शैवदर्शन (त्रिक दर्शन) से प्रभावित थीं। उनकी भक्ति में योग, ज्ञान और प्रेम का अद्भुत समन्वय है। वे निर्गुण ब्रह्म की उपासक थीं — उनके लिए परमात्मा किसी एक मंदिर या मस्जिद तक सीमित नहीं, बल्कि हर जीव में व्याप्त है।
2. वाखों का हिंदी अनुवाद एवं भावार्थ
NCERT की क्षितिज-1 पाठ्यपुस्तक में ललद्यद के चार वाख संकलित हैं। मूल वाख कश्मीरी भाषा में हैं; NCERT ने इनका हिंदी अनुवाद भी दिया है।
वाख — 1
हिंदी अनुवाद:
रस्सी कच्चे धागे की, खींच रही मैं नाव।
जाने कब सुन मेरी नाविक, दे दो तुम किनारा।
जल में कुम्भ, कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी।
फूटा कुम्भ, जल जलहि समाना, यह तथ कथो ज्ञानी।
भावार्थ: इस वाख में ललद्यद ने अपनी आत्मा की दुर्बलता और ईश्वर-कृपा की आवश्यकता को व्यक्त किया है। वे कहती हैं — मैं कच्चे (कमज़ोर) धागे से बनी रस्सी से जीवन-रूपी नाव को खींच रही हूँ। यह नाव कभी भी डूब सकती है क्योंकि यह रस्सी (मेरी साधना, मेरी भक्ति) बहुत कमज़ोर है। हे परमात्मा, मेरी पुकार सुनो और मुझे भवसागर से पार कर दो।
दूसरे भाग में वे एक गहरे दार्शनिक सत्य को उजागर करती हैं — जिस प्रकार मिट्टी के घड़े (कुम्भ) के भीतर भी जल है और बाहर भी जल है, घड़ा जल के भीतर डूबा है — इसी तरह आत्मा भी परमात्मा के भीतर है और परमात्मा भी आत्मा के भीतर है। जब घड़ा फूट जाता है तो उसका जल बाहर के जल में मिल जाता है — ठीक उसी तरह जब देह रूपी घड़ा नष्ट होता है, तो आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है। यह ज्ञानियों का सत्य है। आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है — दोनों एक ही हैं।
केंद्रीय भाव: भक्त की असहायता और ईश्वर की सर्वव्यापकता। आत्मा और परमात्मा का अभेद।
वाख — 2
हिंदी अनुवाद:
खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं, न खाकर बनेगा अहंकारी।
सम खा तभी होगा समभावी, साधो, साधना यही तुम्हारी।
भावार्थ: इस वाख में ललद्यद ने मध्यमार्ग (संतुलित जीवन) का संदेश दिया है। वे कहती हैं — यदि तुम अत्यधिक खाते-भोगते रहे (विषय-वासनाओं में डूबे रहे) तो ईश्वर को नहीं पा सकते। और यदि बिल्कुल न खाकर, कठोर तपस्या और उपवास करते रहे, तो मन में अहंकार आ जाएगा कि "मैं इतना बड़ा तपस्वी हूँ।" दोनों ही अति से बचकर संतुलित जीवन जीना ही सच्ची साधना है। न अति-भोग, न अति-त्याग — बल्कि सम (समान) भाव से जीना।
यह वाख मनुष्य को यह भी समझाता है कि बाहरी क्रियाओं (खाने-न-खाने, व्रत-उपवास) से नहीं, बल्कि मन की शुद्धता और समभाव से ईश्वर मिलता है। यह बौद्ध दर्शन के मध्यम मार्ग से भी मेल खाता है।
केंद्रीय भाव: मध्यमार्ग — न अतिभोग, न अति-त्याग। समभाव ही सच्ची साधना।
वाख — 3
हिंदी अनुवाद:
आई सीधी राह से, गई न सीधी राह।
सुषुम-सेतु पर खड़ी थी, बीत गया दिन आह।
जेब टटोली, कौड़ी न पाई।
माझी को दूँ, क्या उतराई।
भावार्थ: यह वाख जीवन की निरर्थकता और पछतावे की मार्मिक अभिव्यक्ति है। ललद्यद कहती हैं — मैं इस संसार में सीधी राह (ईश्वर-भक्ति के मार्ग) से आई थी, परन्तु जाते समय मैं उस सीधी राह पर नहीं रह पाई — अर्थात् जीवन भर भटकती रही। मैं सुषुम-सेतु (इड़ा-पिंगला के मध्य सुषुम्ना नाड़ी के पुल) पर खड़ी थी — योग-साधना के उस मार्ग पर थी जो परमात्मा तक ले जाता है — पर दिन बीत गया, आयु समाप्त हो गई।
अब जब जेब (जीवन का कोश) टटोली तो कोई कौड़ी (सत्कर्म, पुण्य, भक्ति का फल) नहीं मिली। अब माझी (मृत्यु के बाद का मार्गदर्शक) को उतराई (भाड़ा, किराया) क्या दूँ? जीवन व्यर्थ चला गया, हाथ में कुछ भी नहीं बचा।
केंद्रीय भाव: जीवन की क्षणभंगुरता। समय का सदुपयोग न करने का पश्चाताप। सांसारिक मोह में भटककर भक्ति न करने का दुख।
वाख — 4
हिंदी अनुवाद:
थल-थल में बसता है शिव ही, भेद न कर क्या हिंदू-मुसलमाँ।
ज्ञानी है तो स्वयं को जान, यही है साहिब से पहचान।
भावार्थ: यह वाख ललद्यद का सबसे प्रसिद्ध संदेश देता है। वे कहती हैं — थल-थल में (हर स्थान में, कण-कण में) शिव (परमात्मा) बसते हैं — वे किसी एक धर्म, मंदिर, मस्जिद तक सीमित नहीं हैं। इसलिए हिंदू और मुसलमान में भेद मत करो, क्योंकि दोनों में एक ही परमात्मा निवास करता है। यदि तुम सच में ज्ञानी हो, तो पहले स्वयं को जानो (आत्म-ज्ञान प्राप्त करो) — यही परमात्मा को पहचानने का सच्चा मार्ग है।
यह वाख सांप्रदायिक भेदभाव का खंडन करता है और सर्वधर्म समभाव का उद्घोष करता है। "स्वयं को जानो" का दर्शन यहाँ बहुत गहरे अर्थ में प्रयुक्त है — जो अपनी आत्मा को जान लेता है, वह परमात्मा को जान लेता है।
केंद्रीय भाव: ईश्वर की सर्वव्यापकता। धार्मिक भेदभाव का विरोध। आत्म-ज्ञान ही ईश्वर-ज्ञान है।
3. मुख्य विषय एवं भाव
3.1 ईश्वर की खोज — भीतर बनाम बाहर
ललद्यद के वाखों में सबसे प्रमुख विषय है — ईश्वर को बाहर नहीं, भीतर खोजना। वे बार-बार यह संदेश देती हैं कि परमात्मा मंदिर-मस्जिद, तीर्थ-यात्रा या बाहरी अनुष्ठानों में नहीं मिलता। वह तो हर प्राणी की आत्मा में, कण-कण में व्याप्त है। चौथे वाख में "थल-थल में बसता है शिव" — यह उनका सर्वाधिक स्पष्ट उद्घोष है।
3.2 आत्म-शोध — स्वयं को जानना
"ज्ञानी है तो स्वयं को जान" — यह ललद्यद का मूल दर्शन है। वे कहती हैं कि जब तक मनुष्य अपनी आत्मा को नहीं जानता, वह परमात्मा को नहीं जान सकता। आत्म-ज्ञान और ब्रह्म-ज्ञान एक ही हैं। यही कश्मीर शैव दर्शन का सार है।
3.3 निर्गुण भक्ति
ललद्यद निर्गुण भक्ति की उपासक हैं। उनका परमात्मा न किसी मूर्ति में है, न किसी रूप-रंग में। वह निराकार, सर्वव्यापी और अनंत है। इसीलिए वे हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के बाहरी आडंबरों का खंडन करती हैं। इस दृष्टि से वे कबीर की भाव-परंपरा की पूर्वज हैं।
3.4 मध्यमार्ग और समभाव
दूसरे वाख में वे मध्यमार्ग का संदेश देती हैं — न अतिभोग, न अति-त्याग। समभाव — अर्थात् जीवन की हर परिस्थिति में संतुलित रहना — यही सच्ची साधना है।
3.5 जीवन की क्षणभंगुरता और पश्चाताप
तीसरे वाख में उन्होंने मानव-जीवन की क्षणभंगुरता और साधना न कर पाने के गहरे पश्चाताप को व्यक्त किया है। यह एक आत्म-स्वीकृति है — जीवन बीत गया, कुछ भी सार्थक नहीं हुआ। यह भाव पाठक को जागरण का संदेश देता है।
3.6 सांप्रदायिक सद्भाव
14वीं शताब्दी में जब हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य चरम पर था, ललद्यद ने धार्मिक एकता और सांप्रदायिक सद्भाव का साहसपूर्वक उद्घोष किया। वे दोनों समुदायों द्वारा पूजी जाती हैं — यह उनके संदेश की सार्वभौमिकता का प्रमाण है।
4. प्रतीक और बिम्ब
| प्रतीक / बिम्ब | अर्थ | वाख |
|---|---|---|
| कच्चे धागे की रस्सी | साधक की कमज़ोर, अधूरी भक्ति-साधना | वाख 1 |
| नाव खींचना | भवसागर में जीवन जीने का संघर्ष; ईश्वर-कृपा की आवश्यकता | वाख 1 |
| जल में कुम्भ / कुम्भ में जल | आत्मा और परमात्मा का अभेद; ब्रह्म की सर्वव्यापकता | वाख 1 |
| फूटा कुम्भ | देह का नाश; मृत्यु के बाद आत्मा का परमात्मा में विलय (मोक्ष) | वाख 1 |
| खाना / न खाना | भोग और त्याग की दो अतियाँ | वाख 2 |
| सुषुम-सेतु | योग में सुषुम्ना नाड़ी — परमात्मा-प्राप्ति का मार्ग | वाख 3 |
| जेब में कौड़ी न होना | जीवन भर कोई सत्कर्म या भक्ति न कर पाना; रिक्त जीवन | वाख 3 |
| माझी और उतराई | मृत्यु के बाद का मार्गदर्शक; मुक्ति का मूल्य (सत्कर्म) | वाख 3 |
| थल-थल में शिव | परमात्मा की सर्वव्यापकता — हर स्थान, हर कण में ईश्वर | वाख 4 |
| हिंदू-मुसलमाँ में भेद | धार्मिक संकीर्णता जो मनुष्य को ईश्वर से दूर करती है | वाख 4 |
5. काव्य-सौंदर्य
5.1 भाषा-शैली
ललद्यद के वाखों की मूल भाषा कश्मीरी है। NCERT में इनका हिंदी अनुवाद दिया गया है। अनुवाद में भी सरल, बोलचाल की भाषा का प्रयोग हुआ है। भाषा की विशेषताएँ:
- सांकेतिकता: गहरी बात थोड़े शब्दों में कही गई है।
- लोक-तत्त्व: रोज़मर्रा के बिम्ब — नाव, रस्सी, कुम्भ, जेब, माझी — दार्शनिक अर्थ दिए गए हैं।
- सादगी: कोई अलंकार-बाहुल्य नहीं; सीधी, खरी भाषा।
5.2 छंद-विधान
वाख एक चतुष्पादी लोक-काव्य विधा है — चार पंक्तियों में एक पूर्ण भाव व्यक्त होता है। यह विधा कश्मीर की अपनी मौलिक काव्य-परंपरा है। इसमें एक निश्चित लय और संगीतात्मकता होती है।
5.3 प्रमुख अलंकार
- रूपक: "कच्चे धागे की रस्सी" — भक्ति को कच्ची रस्सी कहना; "जल में कुम्भ" — आत्मा-परमात्मा संबंध
- उपमा: आत्मा की दुर्बलता को कच्ची रस्सी से उपमा
- विरोधाभास: "जल में कुम्भ, कुम्भ में जल" — दोनों एक-दूसरे में हैं, यह विरोधाभास-सा लगता है पर दार्शनिक सत्य है
- अनुप्रास: "थल-थल में" — 'थ' वर्ण की आवृत्ति
- प्रश्न-अलंकार: "माझी को दूँ, क्या उतराई?" — प्रश्न के माध्यम से पश्चाताप की अभिव्यक्ति
5.4 भाव-पक्ष की विशेषताएँ
- आत्मीयता: ललद्यद अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियाँ — कमज़ोरी, पश्चाताप, जिज्ञासा — बेझिझक साझा करती हैं।
- सार्वभौमिकता: उनके विचार किसी एक धर्म, जाति, वर्ग तक सीमित नहीं।
- दार्शनिक गहराई: सरल शब्दों में कश्मीर शैव दर्शन और वेदांत के गूढ़ सत्य प्रस्तुत किए गए हैं।
- स्त्री-स्वर: ललद्यद मध्यकाल में एक स्वतंत्र स्त्री-आवाज़ हैं जो आत्म-साक्षात्कार की बात करती हैं।
6. शब्द-अर्थ (शब्दार्थ)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| वाख | कश्मीरी भाषा की चार पंक्तियों वाली काव्य-विधा; वाणी (संस्कृत 'वाक्' से) |
| कच्चा धागा | कमज़ोर, अपरिपक्व; यहाँ — अधूरी साधना |
| नाव | यहाँ — जीवन-रूपी नाव; भवसागर में आत्मा की यात्रा |
| नाविक | नाव खेने वाला; यहाँ — परमात्मा जो भवसागर से पार करे |
| कुम्भ | मिट्टी का घड़ा; यहाँ — मानव देह |
| जल जलहि समाना | जल जल में ही मिल जाता है — आत्मा का परमात्मा में विलय |
| तथ | सत्य, वास्तविकता |
| समभावी | समान भाव वाला; सुख-दुख में समान रहने वाला |
| सुषुम-सेतु | योग में सुषुम्ना नाड़ी — इड़ा और पिंगला के बीच का मार्ग; परमात्मा-प्राप्ति का रास्ता |
| कौड़ी | छोटा सिक्का; यहाँ — कोई भी सत्कर्म या पुण्य |
| माझी | नाव चलाने वाला; यहाँ — मृत्यु के बाद का मार्गदर्शक |
| उतराई | नाव का किराया; यहाँ — मुक्ति का मूल्य (सत्कर्म) |
| थल-थल | हर स्थान में, कण-कण में |
| साहिब | मालिक, स्वामी; यहाँ — परमात्मा |
| निर्गुण भक्ति | निराकार, गुण-रहित परमात्मा की भक्ति |
| त्रिक दर्शन | कश्मीर का प्रमुख आध्यात्मिक दर्शन जिसमें शिव को एकमात्र सत्य माना जाता है |
7. NCERT प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: ललद्यद ने 'कच्चे धागे की रस्सी' और 'नाव' के प्रतीकों का क्या उद्देश्य रखा है?
उत्तर: 'कच्चे धागे की रस्सी' साधक की अपरिपक्व, अधूरी भक्ति-साधना का प्रतीक है। इसी कमज़ोर साधना के सहारे वह जीवन-रूपी नाव को भवसागर में खींच रही है। नाव यहाँ जीवन का प्रतीक है जो किसी भी क्षण डूब सकती है। इन प्रतीकों के माध्यम से ललद्यद यह बताना चाहती हैं कि मनुष्य की साधना कितनी भी कमज़ोर क्यों न हो, यदि वह ईश्वर को पुकारे तो ईश्वर उसे पार लगा देते हैं। यह ईश्वर की असीम करुणा और भक्त की विनम्रता का चित्रण है।
प्रश्न 2: "जल में कुम्भ, कुम्भ में जल है" — इस पंक्ति के माध्यम से कवयित्री क्या कहना चाहती हैं?
उत्तर: इस पंक्ति के माध्यम से ललद्यद आत्मा और परमात्मा के अभेद का दर्शन प्रस्तुत करती हैं। जिस प्रकार घड़े के भीतर और बाहर दोनों ओर जल ही है — घड़ा जल में है और जल घड़े में है — ठीक उसी प्रकार आत्मा परमात्मा में है और परमात्मा आत्मा में। जब घड़ा (देह) टूट जाता है तो उसका जल बाहर के जल में मिल जाता है — यही मोक्ष है। ज्ञानियों का यह परम सत्य है कि आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं।
प्रश्न 3: दूसरे वाख में ललद्यद ने किस प्रकार के जीवन को सर्वश्रेष्ठ बताया है?
उत्तर: दूसरे वाख में ललद्यद ने मध्यमार्ग को सर्वश्रेष्ठ बताया है। वे कहती हैं कि न तो अत्यधिक भोग करने से ईश्वर मिलता है और न ही अत्यधिक त्याग और उपवास से — क्योंकि उपवास में अहंकार आ जाता है। सम खाना — अर्थात् संतुलित, सम भाव से जीना ही सच्ची साधना है। यह समभाव जीवन की हर परिस्थिति में शांत और स्थिर रहने की अवस्था है। न अति-भोग, न अति-त्याग — यही साधक का मार्ग है।
प्रश्न 4: तीसरे वाख में "जेब टटोली, कौड़ी न पाई" का क्या आशय है?
उत्तर: "जेब टटोली, कौड़ी न पाई" — यह पंक्ति जीवन भर के पश्चाताप की अभिव्यक्ति है। यहाँ 'जेब' जीवन-काल का प्रतीक है और 'कौड़ी' सत्कर्म, पुण्य और भक्ति का। ललद्यद कहती हैं कि जीवन भर सुषुम-सेतु (साधना के मार्ग) पर खड़ी रही — अर्थात् साधना का अवसर था — पर कुछ भी सार्थक नहीं किया। अब मृत्यु के बाद माझी को उतराई (मुक्ति का मूल्य) देना है, पर हाथ में कुछ भी नहीं। यह पंक्ति पाठक को जागरण का संदेश देती है।
प्रश्न 5: "थल-थल में बसता है शिव ही" — इस पंक्ति का क्या अभिप्राय है?
उत्तर: इस पंक्ति का अभिप्राय है कि परमात्मा (शिव) हर स्थान पर, हर कण में व्याप्त हैं — वे किसी एक धर्म, मंदिर या मस्जिद तक सीमित नहीं हैं। इसलिए हिंदू और मुसलमान में भेद करना व्यर्थ है क्योंकि दोनों में एक ही परमात्मा बसता है। ललद्यद 14वीं सदी में साम्प्रदायिकता के विरुद्ध यह साहसिक उद्घोष करती हैं। यह पंक्ति ईश्वर की सर्वव्यापकता और सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश देती है।
प्रश्न 6: ललद्यद के वाखों में आत्म-ज्ञान का क्या महत्त्व बताया गया है?
उत्तर: ललद्यद के वाखों में आत्म-ज्ञान सर्वोच्च साधना है। चौथे वाख में वे कहती हैं — "ज्ञानी है तो स्वयं को जान, यही है साहिब से पहचान।" अर्थात् यदि सच्चे ज्ञानी बनना है तो पहले अपनी आत्मा को जानो। जो स्वयं को जान लेता है, वह परमात्मा को जान लेता है। बाहरी खोज, तीर्थ-यात्रा, धार्मिक आडंबर सब व्यर्थ हैं यदि भीतर की खोज न हो।
प्रश्न 7: वाख और साखी में क्या अंतर है?
उत्तर:
| वाख | साखी |
|---|---|
| कश्मीरी भाषा की काव्य-विधा | हिंदी/सधुक्कड़ी भाषा की काव्य-विधा |
| चार पंक्तियाँ (चतुष्पादी) | दो पंक्तियाँ (दोहा छंद) |
| ललद्यद से संबंधित | कबीरदास से संबंधित |
| 'वाक्' (संस्कृत) से बना = वाणी | 'साक्षी' (संस्कृत) से बना = गवाह |
| कश्मीर शैव दर्शन से प्रभावित | वेदांत और सूफी दर्शन से प्रभावित |
- राजस्थान
- पंजाब
- कश्मीर
- गुजरात
- वक्त
- वाक्
- वाखी
- वाच्य
- कमज़ोर शरीर का
- गरीबी का
- अधूरी भक्ति-साधना का
- जीवन की छोटी अवधि का
- पानी की महत्ता
- आत्मा और परमात्मा का अभेद
- कुम्हार के काम की सराहना
- जल-संरक्षण का संदेश
- खूब खाओ और स्वस्थ रहो
- सख्त उपवास करो
- न अतिभोग, न अति-त्याग — समभाव ही साधना है
- मंदिर-मस्जिद जाओ
- नदी में नाव चलाने वाले का
- मृत्यु के बाद आत्मा को ले जाने वाले का
- गुरु का
- पिता का
- सगुण भक्ति
- निर्गुण भक्ति
- शाक्त भक्ति
- वैष्णव भक्ति
- शिव मंदिरों में निवास करते हैं
- परमात्मा कण-कण में व्याप्त है
- कैलाश पर्वत ही शिव का घर है
- शिव केवल हिंदुओं के देवता हैं
- शास्त्रों के अध्ययन पर
- गुरु की आज्ञा पालन पर
- आत्म-ज्ञान पर
- तीर्थ-यात्रा पर
- तुलसीदास
- सूरदास
- कबीरदास
- रसखान
- एक कश्मीरी पुल का नाम
- योग में सुषुम्ना नाड़ी — परमात्मा-प्राप्ति का मार्ग
- एक प्रकार का ध्यान
- जीवन का अंतिम पड़ाव
- हिंदुओं में 'लल्लेश्वरी', मुस्लिमों में 'लाल आरिफा'
- हिंदुओं में 'लल्लादेवी', मुस्लिमों में 'लालाबाई'
- दोनों में केवल 'ललद्यद' नाम से
- हिंदुओं में 'राधा', मुस्लिमों में 'रबिया'
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